जनवरी 05, 2015

मूर्खो अपने पुरखों पर गर्व करो. हम विश्वगुरु थे और विश्वगुरु रहेंगे !


महान ज्ञानी विश्वगुरु हिन्दुराष्ट्र - जम्बूद्वीप की जय हो !!

विश्वगुरु जम्बुद्वीप का भूगोल
पृथ्वी पर सात द्वीप हैं. अलबेरुनी मत्स्य और विश्नुपुरण के आधार पर लिखता है: "हिन्दुओं के धार्मिक इतिवृत्तों के अनुसार पृथ्वी, जिस पर हम रहते हैं, गोल है, और समुद्रों से घिरी है. समुद्र पर पृथ्वी गलमेख्ला की तरह पड़ी है और इस पृथ्वी पर फिर गलमेख्ला की तरह समुद्र है. शुष्क गलमेख्लाओं की संख्या सात है, जो द्वीप कहे जाते हैं और उसी तरह समुद्रों की संख्या है". विश्नुपुराण में कहा गया है कि जम्बू, पतस, शाल्मल, कुश, क्रौंच, शक और पुष्कर सात द्वीप है, जो चारो और खारे पानी, इत्रुरस, मदिरा, घृत, दही, और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं.
जम्बू द्वीप
जम्बू द्वीप इन सबके मध्य में स्थित है. अलबेरुनी लिखता है: "इसमें उगे हुए एक वृक्ष के कारण यह जम्बू द्वीप कहलाता है. इस वृक्ष की शाखाएं सौ योजन में फैली हुई हैं". उसके इस कथन की पुष्टि विष्णु पुराण से होती है, जिसमे कहा गया है कि जम्बू वृक्ष के कारण 'जम्बू द्वीप' नाम हुआ . इसका उल्लेख पाली और बौद्ध साहित्य में भी हुआ है.


वास्कोडिगामा था हिन्दू मल्लाह वसुदेव दिगंबा

हजारों वर्ष पूर्व जब समूचा विश्व एक महान हिन्दू राष्ट्र था उसी समय जम्बूद्वीप के पड़ोस में बसे एक छोटे से राज्य 'पुत्रगाल' (वर्तमान पुर्तगाल) से एक मछुवारा मछली पकड़ने घर से निकला। वह अपनी छोटी सी नाव में जाल रख कर समुद्र तट पर पहुंचा।
वह अपने लिए पर्याप्त मछलियाँ पकड़ चुका था कि तभी आकाशवाणी हुई "पुत्र तुम्हारा जन्म मछली फंसाने के लिए नहीं कुछ महान करने के लिए हुआ है।"
उसने आकाशवाणी को सीरियसली लिया और फिर से अपने काम में जुट गया। अचानक उसके जाल में इतनी बड़ी मछली फंस गयी जो उसकी बोट से भी भारी थी। उस मछली ने उसे खींचना शुरू किया और जम्बूद्वीप में गोवा के समुद्र तट पर ला पटका। उसे आकाशवाणी पर विश्वास हो गया था क्योंकि उसने विश्वगुरु जम्बूद्वीप की खोज कर ली थी।
उस महान हिन्दू मल्लाह का नाम था वसुदेव दिगंबा जो आगे चल कर वास्कोडिगामा के नाम से प्रसिद्द हुआ। गोवा में उसके नाम से एक रेलवे स्टेशन भी है।


पहिये और वाहनों का अविष्कार


जम्बूद्वीप का भारत खंड आज से एक लाख वर्षो से भी ज्यादा समय से ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में विश्व गुरु रहा है। पिछले पाठ में आपने पढ़ा भारतीय सप्तर्षियों ने किस तरह से आग की खोज की। इसके पश्चात् अब आप पहिये के अविष्कार और वाहनों के आविष्कार के बारे में जानेंगे।
अब से करीब इक्कीस हज़ार वर्ष पहले एक बार अंगिरस ऋषि हजारों मनुष्यों के साथ दक्षिणापथ से उत्तरापथ की ओर जा रहे थे। साथ में अनेको वृद्ध, स्त्री और छोटे छोटे बालक भी थे। सभी लोग मार्ग में एक समान गति से चल नही पा रहे थे। वृद्धों, बालकों और स्त्रियों को मार्ग में अपार कष्ट हो रहा था। ऋषिवर से यह सब देखा नही जा रहा था, वे एक वृक्ष के नीचे उद्विग्न हो कर बैठ गए। उन्होंने देवगुरु बृहस्पति का ध्यान किया। देवगुरु ने उन्हें श्रीमान विश्वकर्मा को स्मरण करने कहा। ऋषि ने ऐसा ही किया और विश्वकर्मा ने उन्हें स्वप्न में पहिया और रथ निर्माण की विधि बताई।
विधि अनुसार एक गोल तने वाले आम के वृक्ष को काटा गया। उसके पहले पूजन और नारियल भी फोड़ा गया। हर शुभ कार्य में नारियल फोड़ना भूलना मत। वृक्ष के तने से चार गोल पहिये नुमा हिस्से निकाले गए। फिर उनके बीच में गोल छेद किया गया, फिर चारपाई के डंडो की तरह उसमे डंडे फंसाए और फिर उस पर फट्टे रखे गए। धूप और वर्षा से बचने के लिए एक डंडे के सहारे छत्र (छाता) भी लगाया गया और विश्व का पहला वाहन निर्मित और अविष्कृत हुआ। अब लोग इस पर बैठ सकते थे। वृद्ध, स्त्री और बालक गण बैठ जाते और सक्षम पुरुष धकेलते थे। पर इससे भी समस्या थी, तो फिर अंगिरस ऋषि ने बृहस्पति को स्मरण किया, उन्होंने इसे चलाने के लिए मन्त्र दिये। चलने के मन्त्र, रुकने के मन्त्र, दायें मुड़ने के मन्त्र, बाएं मुड़ने के मन्त्र सब थे। उन दिनों कागज़ कलम होते नही थे सब कुछ स्मरण रखना होता था।
जब तक मन्त्र स्मरण रहा वाहन (रथ) पूर्णतः स्वचालित रहा। इसमें इंधन की भी आवश्यकता नही होती थी। विश्व का पहला चालक रहित स्वचालित वाहन भारत में अब से इक्कीस हज़ार वर्ष पहले अविष्कृत हो चुका था। अंगिरस ऋषि जब सप्तर्षि तारा मंडल में चले गये तो उनके साथ वाहन चालन वाले मंत्रो का भी लोप हो गया क्योंकि वे किसी को बता के या लिख कर रख नही गए। फिर मनुष्यों ने वाहनों में घोड़े, गधे, बैल, भैंसा आदि जोतना शुरू कर के वाहनों को चलाना शुरू किया।
जब ये वाहन और उनके चालक केरल पंहुचे तो इन्होने वहां के रबड़ के वृक्षों से निकला हुआ रस पहियों पर लपेटना शुरू किया। इससे विश्व के पहले टायर का आविष्कार हुआ। इससे वाहन तेजी से कम ध्वनि करते हुए कच्चे मार्गों पर दौड़ सकते थे। केरल से यह विद्या अरब लोग ले गए और अरबों से यह अविष्कार तुर्की होता हुआ यूरोप पंहुचा, जहाँ पर शुद्ध आर्य रक्त वाले लोग जो कि हम जैसे आर्यों की ही एक शाखा के लोग थे, निवास करते थे, उन्होंने अपने मस्तिष्क का प्रयोग करते हुए कई सुधार किये और उन्होंने इसको आधुनिक मोटर गाड़ी बनाने में परिणत किया।

जम्बूद्वीप के विश्वगुरु ऐवयीं ही विश्वगुरु नहीं बन गए। कठिन-कठोर तपस्या के बगैर सुई से लेकर तलवार और फिर पहिये से लेकर पुष्पक विमान तक का आविष्कार कहाँ सम्भव हो पाता भला। ज्ञान की खोज में विश्वगुरु किसी भी सीमा तक जाने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने जान लिया था कि समस्त ज्ञान मार्ग में मात्र एक ही रोड़ा है। मनुष्य यदि "वायु-विकार" से मुक्त हो जाए तो वह हर आविष्कार और खोज को शिकार कर सकता है...


रसायन विज्ञान का ज्ञान जम्बूद्वीप वासियों से


जम्बुद्वीप वासी प्राचीनकाल से ही रसायन शास्त्र के प्रकांड ज्ञाता थे । उन्होंने ही सम्पूर्ण सृष्टि का संघटन ज्ञात किया था । पांच मूल तत्वों में ही समस्त जैविक अजैविक पदार्थों को समाहित कर लिया था, जिन्हें क्रमशः धरती जल अग्नि आकाश एवं वायु के नाम से जाना जाता है ।आज ज्ञात 118 तत्वों की खोज इन्ही मूल तत्वों से ही की जा सकी है , जैसे ऑक्सीजन या नाइट्रोजन की खोज वायु से , कैल्सियम मैग्नीशियम आयरन आदि को धरती से और हाइड्रोजन को जल से ही खोजा गया ।समस्त रासायनिक संयोग के नियमभी उसी समय खोज लिए गए थे जैसे : द्रव्य की अविनाशिता का नियम :- इस नियम को गीता के उस श्लोक से उद्धृत किया गया है ,जिसमे भगवान श्रीकृष्ण कहते है हे अर्जुन ! आत्मा अजर अमर है ,इसे न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट ।
कालान्तर में फिरंगी वैज्ञानिकों ने सिर्फ आत्मा की जगह द्रव्य (matter)शब्द लिख कर इसे अपने नाम के साथ पेटेंट करवा लिया ।
इन सिद्धांतों के अतिरिक्त कणाद मुनि ने वैशेषिक दर्शन नामक पुस्तक में परमाणु के नाभिकीय विखंडन के सिद्धांत का बहुत ही गूढ़ वर्णन किया है जिसे 20वी सदी में उन्ही के वंशज रामपलट ईश्वरदीन (अलबर्ट आइन्स्टीन) ने समझा था फिर कुछ सालो बाद पर्वतीय प्रदेश में वास करने वाले " निशंक" उपनाम के उनके ही वंशज ने ,उनकी पुस्तक के सभी गूढ़ सिद्धन्तों को जनता के सामने सरल भाषा में प्रस्तुत कर ,फिरंगियो को निरुत्तर कर दिया ।ऋषि
वाल्मीकि को हनुमान जी ने सूर्य में नाभिकी संलयन होने की प्रक्रिया ,अभिक्रिया के समस्त पदों के साथ,मय उदाहरण समझा दी थी जिसका वर्णन वाल्मीकि रचित मूल ग्रन्थ में था ,जिसे फिरंगी चुरा कर अपने देश लेते गए ।इस प्रकार यह सिद्ध होता है की पृथ्वी वासियों को रसायन विज्ञान का ज्ञान भी जम्बूद्वीप वासियों से ही मिला है ।


हिन्दू सेनाओं का वह महान बंकर नगर अस्त्र लिया ""ऑस्ट्रेलिया

प्राचीन विश्व में जब हिन्दुराष्ट्र जम्बूद्वीप उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक फैला था तब समुद्र के किनारे एक अत्यंत सुरक्षित स्थान पर अस्त्र शस्त्रों का निर्माण और सभी हिन्दू सेनाओं को वहीँ से सप्लाई होती थी।
उस स्थान का नाम था "अस्त्र लिया"। वहीं उस द्वीप के साइड में जो सागर है वो तब क्षीरसागर हुआ करता था जिसके अंदर भगवान विष्णु अपने शेषनाग की शैय्या पर पड़े पड़े सीरियल वाले भगवान की तरह मंद मंद मुस्काते रहते थे। उनकी नाभि से निकला कमल जो आज वहीं समुद्र तट पर भव्य ईमारत का रूप ले चुकी है, अंग्रेज उसे "ओपेरा हॉउस" कहते हैं।
जम्बूद्वीप की प्राचीन हिन्दू सेनाओं का वह महान बंकर नगर अस्त्र लिया ही आगे चल कर ""ऑस्ट्रेलिया के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

 

आधुनिक ऋषि हर्षवर्धन जी का दावा पृथा नाम के ऋषि ने दिया पाइथागोरस थेओरेम

प्राचीन काल में जम्बुद्वीप पर एकपृथा नाम के ऋषि थे, उन्हें गणित, बीज गणित और ज्यामिति में महारथ हासिल थी उन्होंने एक प्रमेय सिद्ध किया था जो जम्बुद्वीप में बहुत कम लोगो को ही पता था। सिकंदर ने जब पुरु से सिन्धु नदी के तट पर युद्ध किया और उसे पराजित किया था तो पुरु ने पृथा ऋषि की सारी पांडुलिपियाँ सिकन्दर को दे दी। बाद में उसमे से उस प्रमेय पर काम हुआ जिसे यूनानी लोगों ने विश्व भर में पाइथागोरस थेओरेम के नाम से अपना बता के दुनिया भर में वाह वाही लूटी। पर अब यह नही चलने देंगे। आधुनिक ऋषि हर्षवर्धन जी ने कल विश्व के सामने पाइथागोरस थेओरेम पर अपने उत्तराधिकार का दावा ठोंक दिया है। हे जम्बुद्वीप के मूर्खों गर्व करो अपने पुरखों पर।


 देश का प्राचीन विज्ञान

विश्व में सबसे पहले हमारे पुरखों ने ही स्टेम सेल क्लोनिंग की तकनीक से बच्चे पैदा किये थे. महाभारत काल में ऋषि वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से उत्पन्न मांस पिंड के एक सौ एक टुकड़े किये. फिर प्रत्येक टुकड़ों को एक घी से भरे मटके में रख दिया और नौ महीने पश्चात प्रत्येक मटके से एक बच्चा उत्पन्न हुआ. सौ कौरव उत्पन्न हुए और उनकी एक बहन दुश्शला भी पैदा हुई. अभी तक आधुनिक विश्व इस तकनीक से बच्चे पैदा नहीं कर सका है. इससे सिद्ध होता है कि हम लोग विश्वगुरु हैं. मूरखों अपने पुरखों पर गर्व करो. हम विश्वगुरु थे और विश्वगुरु रहेंगे.
कहते हैं विश्व का विज्ञान और चिकित्सा पद्धति उस समय गर्भ में थी जब प्राचीन जम्बूद्वीप में डॉक्टरी अपने चरम पर थी। आपको जो हम आज बताने जा रहे हैं वो आपको मालूम तो बहुत पहले से लेकिन उस पर कभी गर्भ नहीं किया होगा।
आज दुनिया जिस टेस्ट ट्यूब बेबी की तकनीक को सर चढ़ाये है इसका प्रयोग जम्बूद्वीप वासियों ने सदियों पहले करना शुरू कर दिया था। 
इस तकनीक का सर्वप्रथम उपयोग त्रेतायुग में हुआ था जब राजा दशरथ को कोई संतान नहीं हो रही थी। तभी मशहूर वैद्य ऋषि वशिष्ठ ने उनको इस उच्च स्तरीय व्यवस्था से अवगत कराया था। ऋषि वशिष्ठ के प्रताप से, टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक से और प्रजा की शुभकामनाओं से राजा दशरथ हजारों वर्ष पूर्व पितृ सुख प्राप्त किये थे।

टूथब्रश और मंजन का आविष्कार

टूथब्रश और मंजन का आविष्कार अब से सात हज़ार वर्ष पहले हमारे ऋषियों ने ही किया था. जब कश्यप सागर (कास्पियन सी) की तरफ से हमारे पूर्वजों ने जम्बूद्वीप के भारत खंड में अपनी बस्तियां बसाई और यहाँ के उष्ण और समशीतोष्ण जलवायु में रहने लगे तो पाया कि उनके दांत बदरंग होके काले पीले हो गए हैं और उनके मुंह से दुर्गन्ध आने लगी है, और इस दुर्गन्ध से सिर्फ आसपास के लोग ही नहीं बल्कि खुद भी हर कोई परेशान थे. अतः सभी ऋषियों ने देव चिकित्सक धन्वन्तरी की आराधना की, धन्वन्तरी अपनी स्तुत्ति और वंदना से प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रसन्न हो कर उन्हें प्रेरणा दी कि नीम के पेड़ की डेढ़ बित्ता लम्बी टहनी को मुंह में ले के घंटो तक चबाएं और उसे अपने दांतों पर रगड़ें. लोगों ने ऐसा ही करना शुरू किया, और पाया कि दांत भी चमकने लगे और मुंह से दुर्गन्ध भी आनी बंद हो गयी, इस तरह से हमारे पूर्वजों ने टूथब्रश का अविष्कार किया, उनलोगों ने इसे दातून कहा, क्यों कि यह दांतों को रगड़ता था. अतः जम्बूद्वीप के लोग दातून से अपने दांत साफ़ करने लगे. हजारों सालों बाद फिरंगी विज्ञानिको ने पता लगाया कि नीम में कीटाणुनाशक तेल होता है और वो मुंह के अन्दर मौजूद दुर्गन्ध के कीटाणुओं को मार देता है.
पर नीम का पेड़ हर जगह मिलता नहीं था, इसलिए फिर लोग परेशान हुए, फिर लोगों ने धन्वन्तरी का आवाहन किया, उनकी स्तुति वंदना की, इस बार देव चिकित्सक थोड़े चिढ कर बोले, खुद भी कुछ अविष्कार किया करो, फिर ऋषियों ने स्तुति करके उन्हें मस्का लगाया और प्रसन्न किया, फिर उन्होंने कहा, जब नीम की दातुन नहीं मिले तो यज्ञ-हवन की बुझी हुई राख, या चूल्हे की राख को तर्जनी ऊँगली पर रख कर दांतों में घिसा करो, उससे दांत चमकने लगेंगे. फिर इस तरह से विश्व का पहला दन्तमंजन का अविष्कार हुआ, 


वैदिक युग में भारत में ऐसे विमान थे जिनमें रिवर्स गियर था

वैदिक युग में भारत में ऐसे विमान थे जिनमें रिवर्स गियर था यानी वे उलटे भी उड़ सकते थे। इतना ही नहीं, वे दूसरे ग्रहों पर भी जा सकते थे। सच है या नहीं, कौन जाने। अब एक जाना-माना वैज्ञानिक इंडियन साइंस कांग्रेस जैसे प्रतिष्ठित कार्यक्रम में भाषण के दौरान ऐसी बातें कहेगा तो आप क्या कर सकते हैं!

.हनुमान जी की फ्लाइट

रामायण में उड़ने का जिक्र है. पुष्पक तो विमान था ही, उसमे कई लोग बैठ कर उड़ सकते थे, लंका से भारत आ जा सकते थे. पर विचार करें तो सबसे विचित्र हनुमान जी की उड़ने की शक्ति है. कवियों की कल्पना ने रामायण में सब गडमड्ड वृतांत दिए हैं. हनुमान जी स्वयम उड़ सकते थे, मतलब हेलीकाप्टर, वायुयान या राकेट जैसे मशीने या इंजन का उपयोग नहीं करते थे. ऐसा एक ही चीज़ से संभव है ग्लाइडिंग के जरिये. मानिए हनुमान जी ग्लाइडर से ही उड़ा करते थे. यह ग्लाइडर या तो उनकी त्वचा के साथ फिट था, जैसे फ्लाइंग फॉक्स, फ्लाइंग स्नेक, फ्लाइंग स्क़ुइरेल्ल में होता है, या फिर वे अपने लिए एक लकड़ी, कपड़ों से बना हुआ ग्लाइडर रखा करते थे. उनके उड़ने के वृतांत रामायण में तीन चार जगह ही आये हैं, पहली बार बाल हनुमान सूर्य की ओर उड़ते हैं. दूसरी बार वे लंका उड़ कर जाते हैं माता सीता की खोज में, और तीसरी बार संजीवनी बूटी लाने के लिए उड़ते हैं. बाकी समय हनुमान जी पैरों पर ही चलते दीखते हैं. हनुमान जी पवनपुत्र हैं, और जिस तरह बच्चे पिता की गोद में खेलते हैं, वैसे ही हनुमान जी हवा में खेलते हैं, अपने करतब दिखाते हैं, इसका मतलब एक ग्लाइडर से ही यह सब संभव है. हनुमान जी को श्राप मिलता है और वो अपनी उड़ने की शक्ति/तकनीक भूल जाते हैं, और बाद में सीता अनुसन्धान के समय सभी साथियों द्वारा याद दिलाने पर उन्हें अपनी भूली हुई उड़ने की शक्ति/तकनीक का दुबारा ज्ञान होता है और फिर वो दुबारा उड़ सकने में सक्षम होते हैं. इससे सिद्ध होता है कि रामायण काल में ही ग्लाइडर का अविष्कार हो चुका था, और हनुमान जी इस तकनीक से उड़ने वाले पहले व्यक्ति/देव थे. बाद में यह तकनीक जर्मन मैक्स्मुलेर के अनुवादित रामायण से यूरोपियन लोगों ने पाया है और अपना ठप्पा लगाया है. मूर्खो गर्व करो अपने पुरखो पर, विश्वगुरु थे हम.

न्यूटन नहीं ऋषि कणाद ने दिए गति के तीन नियम

 करीब पांच हज़ार साल पहले ही जम्बुद्वीप पर ऋषि कणाद ने गति के तीन नियमों का पता लगा लिया था। न्यूटन को हमलोग खामखाह में क्रेडिट देते हैं। हमारा सारा विज्ञान फिरंगियों ने चुरा लिया है। मोदिराज में हमे उसे वापस लाना है और जम्बुद्वीप को फिर से विश्वगुरु बनाना है।

मीडिया का आविष्कार


कहते हैं जब समस्त यूरोप, प्राचीन जम्बूद्वीप हिन्दुराष्ट्र से अलग हो गया था (प्राकृतिक कारणों से क्योंकि जबरदस्ती भागने की औकात नहीं थी उनकी) तो उसकी सभ्यता और संस्कृति जीरो बटा सन्नाटा थी। वो लोग नंगे घुमते थे और इधर भारत में मीडिया का आविष्कार हो गया था। 
अंग्रेज मीडिया का म नहीं खोज पाये थे और यहाँ 'ना' खोज लिया गया था। जी हाँ नारद, देवर्षि नारद। वह इस अनंत ब्रम्हांड और अकल्प्य भूमण्डल के पहले ऑल इन वन मीडिया पर्सन हैं। देवताओं ने उन्हें हाई क्वालिटी कैमरे के लिए दिव्य दृष्टि, ओबी वैन से चार कदम आगे और सौ गुना तेज अंतर्ध्यान होकर घटनास्थल पर पहुँचने की शक्ति दी हुई थी। कहते हैं स्वर्ग में नारद आज भी अवैतनिक मीडिया के रूप में कार्यरत हैं।
उसके बाद एक विराट हिन्दू ऋषि अगस्त्य फिरकी ने इसे औपचारिक रूप से मानवों के लिए भी उपलब्ध कराया क्योंकि देवताओं ने नारद को अपने लिए रिजर्व कर लिया था।
जब अंग्रेजों ने आँखें खोलीं तो सबसे पहले हमारे आविष्कारों को अपना बता कर दुष्प्रचार करना शुरू किया। और अगस्त्य का नाम बदल कर आगस्टस हिक्की कर दिया। आगे की कहानी तो सब जानते हैं कितनी बार बताएं


त्वचा के मनचाह रंग की खोज


जम्बूद्वीप वाशी अपनी त्वचा का मनचाहा रंग प्राप्त कर सकते थे । इसके लिए उन्होंने एक विशेष मन्त्र में अभिमंत्रित गोबर , गोमूत्र ,गाय का मक्खन ,सिन्दूर और चन्दन से एक ख़ास मिश्रण तैयार किया था । किसी को गहरा काला रंग चाहिए होता था तो वो काली गाय के गोबर ,मूत्र एवं मक्खन वाले मिश्रण का प्रयोग करता था और अगर किसी को गोरी त्वचा चाहिए तो वह हल्की भूरी रंगत वाली गाय के गोबर मूत्र और मक्खन से निर्मित मिश्रण का । साँवले लोग एक काली और एक सफ़ेद गाय की सहायता से अपना इच्छित मिश्रण प्राप्त कर लेते थे । इसी विशेष गुण के कारण,गाय को माँ का दर्जा प्राप्त था ।ईशा पूर्व आये म्लेच्छ लुटेरों ने उस ग्रन्थ को चुरा लिया जिसमे त्वचा का रंग बदलने वाली विधि उस विशेष मन्त्र के साथ लिखी हुई थी ,परन्तु तब तक जम्बूद्वीप के लोगों में भिन्न रंगत वाली त्वचा का पाया जाना आनुवांशिक हो चुका था । आज भी सिर्फ जम्बू द्वीप के लोगों में ही अलग अलग रंग के लोग पाए जाते हैं।

टेलेविज़न माने दूरदर्शन की खोज कुरुक्षेत्र में 

टेलेविज़न माने दूरदर्शन, और प्राचीन जम्बुद्वीप में दूरदर्शन की शक्ति महाभारत काल में संजय के पास थी. एक सॅटॅलाइट भी रहा होगा जो कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल के ऊपर फिक्स था और ऑडियो विडिओ सिग्नल्स संजय को भेजता था. और संजय रवि शास्त्री, गावस्कर, हर्षा भोगले और सिद्धू की तरह डायरेक्ट कमेंटरी सुनाते थे धृतराष्ट्र को. महाभारत कालीन यह टेक्नोलॉजी मूल रूप से वेदव्यासजी द्वारा रचित महाभारत में वर्णित थी, पर बाद के अनुकृति बनाने वालों ने (कोपी करनेवालों ने) उसमे से यह प्रोद्योगिकी वाला हिसा मूल कथानक में गैर जरुरी समझ कर डिलीट कर दिया. फिर जब उन्नीसवीं सदी में इसाई मिशनरी लोग यहाँ आये तो उन्होंने न जाने कहाँ से एक मूल वेदव्यास रचित महाभारत की प्रति प्राप्त करली. वे उसे यूरोप ले गए, जिसके बरसों तक अध्ययन और डिकोडिंग करने के बाद उसमे से टेलीविजन बनाने की तकनीक हासिल की गई और साथ ही सॅटॅलाइट ट्रांसमिशन की तकनीक भी आगे चल कर विकसित हुई. इससे निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि टेलीविज़न के अविष्कारक मूल रूप से हम लोग ही हैं, क्योंकि अब से करीब पांच हज़ार साल पहले की किसी किताब में किसी ऐसी प्रोद्योगिकी का वर्णन नहीं मिलता है, सिवाए हमारे महाभारत के. मूर्खो जरा गर्व करो अपने पुरखों पर, वे विश्वगुरु थे.

लेजर तकनीक का आविष्कार

लेजर तकनीक का आविष्कार भी जम्बूद्वीप में सदियों पहले हो चुका है। ऋषि मुनि इसी विद्या से लोगों को जलाकर भस्म किया करते थे। तब इस तकनीक को 'ले-जल' बोलते थे। जीहां, हमारे इतिहास के साथ छेड़छाड़ सिर्फ अंग्रेजों ने नहीं की सिर्फ कांग्रेस की देशद्रोही सरकार ने ही बेवकूफ नहीं बनाया बल्कि हमारे धार्मिक ग्रन्थ छापने वालों ने भी घना लोचा किया है।
हमारी मासूमियत और शांतिप्रियता का नाजायज़ फायदा उठाया है।
इन कॉपी पेस्ट वेदों,पुराणों,उपनिषदों में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि समुद्र मंथन में 14 नहीं बल्कि 15 रत्नों की प्राप्ति हुई थी। और वह पन्द्रहवां रत्न था 'बिजली'।
आपने धार्मिक सीरियलों में देखा होगा कि जब कोई ऋषि मुनि क्रोधित होकर श्राप देते हैं तो बिजली कड़कती है। शक्तिमान जब गोल घूम कर गंगाधर से शक्तिमान बनता था तब भी बिजली कड़कती थी। तो यह कोई साधारण आकाशीय बिजली नहीं होती बल्कि वही शुद्ध वैज्ञानिक तकनीक से विकसित की गयी बिजली है जिसे ऋषि मुनि स्विच से एक्टिवेट करने की बजाय मन्त्रों और मस्तिष्क की तरंगों से कंट्रोल करते थे।
इतने वृहत् कार्य में उपयोग होने वाली बिजली को अंग्रेज रेडियो बजाने, पानी गरम करने, मोबाइल चार्ज करने और बल्ब जलाने में करने लगे और दुनिया भर में इसका प्रचार हो गया।
इससे साबित होता है कि इलेक्ट्रिसिटी भी जम्बूद्वीप की खोज है

लैपटॉप हमारा ही अविष्कार है


 संगणक और दुसरे गणितीय यंत्रों और उपकरणों का अविष्कार हमारे विश्वगुरुओं ने जम्बुद्वीप में ही किया था. जब गोरी और गजनी के हमले हुए तो इन उपकरणों के बनाने की प्रोद्योगिकी और कारखाने म्लेच्छों के हाथ में पड़ जाने के भय के कारण नष्ट कर दी गयी, पर जब इसाई मिशनरी यहाँ अट्ठारहवी उन्नीसवी सदी में आये तो उन्होंने हमारे प्राचीन विज्ञान के हस्तलिखित पांडुलिपियों को ढूंढ निकाला और उसके सहारे वो नए नए यंत्र और उपकरण बनाने में सफल हुए. अबसे हजारों वर्ष पहले ही हमारे विश्वगुरु ऋषि-मुनि लैपटॉप का अविष्कार कर चुके थे, और कुरुक्षेत्र से एक गाँव की खुदाई में एक फोटो मिला है, जिसमे वे लैप टॉप पर सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण का कैलकुलेशन करते दिख रहे हैं. इस फोटो से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि लैपटॉप हमारा ही अविष्कार है और डेल कंपनी भी हमारी ही है.


दारु ,व्हिस्की और सोमरस


   हमारे पूर्वज हमेशा से ही खाने और पीने के शौक़ीन थे. उन्होंने खेती करने से पहले शिकार करना सीखा और वन के जीव जंतुओं का मांस भून कर, पका कर खाना सीखा. जब खेती करनी शुरू की तो उन लोगों ने सबसे पहले जौ (संस्कृत यव) की खेती शुरू की, क्योंकि वे जानते थे इससे व्हिस्की बनाई जा सकती है, रोटी की परवाह ही किसे थी, पेट भरने के लिए मांस प्रचुर उपलब्ध था, भाले, तीर धनुष भी थे, किसी भी पशु को मार लेते और पका के खाते, पर दारू का जुगाड़ कैसे हो, इसलिए जौ की खेती का आईडिया आया होगा, इसमें ही वे और दुसरे मसाले और जडीबुटी डाल के तैयार करते थे, और इसे सोमरस कहा करते थे, सोम माने चन्द्रमा और रस माने रस, चन्द्रमा का रस, आज की भाषा में शुद्ध स्कॉच व्हिस्की; यग्य हवन होता, बदन में गर्मी आती और भुने हुए मांस के साथ साथ सोमरस का पान चलता. मस्ती असीमित आती. मतलब यह कि दारु और मांस हमारे डीएनए में है. इसलिए शर्म की कोई बात नहीं है. अपने पुरखों पर गर्व करो मूर्खों, उन्होंने हमें मस्ती से जीवन जीने की प्रेरणा दी है, और अपने जीने का अंदाज़ सिखा गए हैं. जब कोई भी आधुनिक अविष्कार नहीं हुआ था तभी सबसे पहले दारू और मांस खाने का फंडा दे गए. 

आकाशवाणी सूचना और प्रसारण तंत्र


प्राचीन जम्बुद्वीप में सूचना और प्रसारण तंत्र इतना मजबूत था की समय-समय पर आकाशवाणी हुआ करती थी । कुछ आकाशवाणियाँ सबको सुनाई देती थी और कुछ सिर्फ उसी व्यक्ति को जिसे सम्बोधित करके की जाती थीं ।देवदूत अपने अत्यंत उन्नत यंत्रों से प्रत्येक जम्बूद्वीप वासी पर सूक्ष्म निगाह रखा करते थे ,जहाँ कुछ गलत होता देखते , तुरंत भगवान की आज्ञा से उनके सन्देश को उद्घोषक की आवाज में प्रसारित कर देते थे ।
बाद में हुए देव दानव संघर्ष में यह कला दानव लूट ले गए परन्तु उनकी समझ में यह नहीं आया की इसे उपयोग में कैसे लाया जाय ,इसलिए हजारों वर्षों के बाद जम्बुद्वीप के ही उन वासियों द्वारा ,जो किसी कारण वस उनके देश पहुँच गए थे , इस को पुनः शुरू किया जा सका । आज सारी दुनिया इसका भरपूर उपयोग कर रही है
कभी रेडियो तो कभी मोबाइल के रूप में, लेकिन सिर्फ जम्बूद्वीप के भारतखण्ड में इसे आज भी आकाशवाणी के नाम से ही जाना जाता है ।

शास्त्रों वेदों और उपनिषदों के उपायों द्वारा अपनी कठिन से कठिन समस्या का हल कैसे चुटकियों मे

समस्या एवं समाधान नंबर 1-
यदि आप महिला हैं और आपका पति कभी आपकी तारीफ नहीं करता और उसकी हवस की पुजारन आँखें हमेशा पराई स्त्री की तरफ झांकती रहती हैं और उसकी लार टपकाती जिव्हा आपको असह्य मानसिक वेदना प्रदान कर रही है तो:
20 वर्ष से अधिक पुराना जामुन का पेड़ खोज कर उसके लकड़ी से खड़ाऊ बनवाएं और सुबह शाम बिना नागा कम से कम एक महीने उसकी पीठ पर बजाएं, शत प्रतिशत लाभ की गारंटी

आग और बल्ब का आविष्कार

आग का आविष्कार हमारे महान हिन्दू पूर्वजो ने ही किया था. हमारे पूर्वजों में से जो सप्तर्षि गण थे, (आजकल आप उन्हें आकाश में देख सकते हैं, सप्तर्षि तारामंडल, जब आकाश स्वच्छ हो तो), एक बार सातों ऋषि ठण्ड से एक जगह बैठे ठिठुर रहे थे, उनके पास गर्मी पाने का कोई उपाय नहीं था, उन्होंने अग्नि देव को याद किया, अग्नि देव ने उन्हें प्रेरणा दी, कि दधिची ऋषि ने इंद्र को अपना देह दान किया है उसमें से रीढ़ की हड्डियों और पसलियों से वज्र बना है, और बाकी अस्थियाँ पड़ी हुई हैं, आपलोग उसमे से जबड़े की अस्थियाँ लेके उन्हें रगड़ें और तब जा के अग्नि उत्पन्न होगी. तत्पश्चात सातों ऋषियों ने दधिची ऋषि के दोनों जबड़ों को एक पर एक रख कर रगड़ना शुरू किया, रगड़ने वाली जगह के आस पास कुछ तिनके, घास फूस और सूखी लकड़ियाँ पड़ी हुई थीं, जबड़ों के रगड़ने से चिंगारी निकली और उन पर गिर पड़ीं, और इस तरह से आग जल पड़ी और हमारे पूर्वजों ने इस तरह से विश्व को आग का अविष्कार दिया है. आग से गर्मी पाने और उसके बाद खाना पकाने का ज्ञान भी हमारे महान पूर्वजों ने ही विश्व को दिया है. हम लोग हमेशा से ही विश्वगुरु रहे हैं और आगे भी रहेंगे, बच्चों यह बात याद रखना. जब बाल हनुमान ने सेब समझ कर सूर्य को लील लिया था ,तो समस्त पृथ्वी पर घुप्प अँधेरा छा गया । पशु पक्षी रात समझ, जहाँ जगह मिली वही दुबक गए । देवता , असुर ,यक्ष ,किन्नर और मनुष्यों में त्राहि-त्राहि मच गयी । उस समय जम्बुद्वीप में एक ऋषि के आश्रम में अध्ययनरत विद्यार्थियों ने कुछ ही पलों में अपने आश्रम में अति उज्जवल धवल प्रकाश उत्पन्न कर दिया ।
प्रकाश यंत्र उत्पादक मन्त्र को भोजपत्र पर लिख कर ऋषि ने लाल वस्त्र में लपेट कर एक अज्ञात कन्दरा में छिपा दिया ।
युगों बाद कुछ अंग्रेजों ने खुदाई के दौरान यह महत्व पूर्ण ग्रन्थ खोज निकाला।
कई वर्षों तक ये गुप्त सूत्र किसी को समझ नहीं आया । १९वीं शताब्दी में एक अमेरिकन अनपढ़ नवयुवक ने इस गूढ़ सूत्र युक्त मन्त्र को समझ कर बिजली के बल्ब का आविष्कार कर दिया ।यह बालक भी जम्बूद्विप का ही निवाशी था ,जो कतिपय कारणों से अमेरिका में प्रवास करने लगा था ।
इस प्रकार बल्ब के आविष्कारी भी प्राचीन जम्बुद्वीप वासी ही थे ।


विश्वगुरु भारत ही परमाणु बम का अविष्कारकर्ता है


बच्चों आज इस पाठ में हम आपको परमाणु बम के बारे में बताएँगे. महाभारत काल के पहले से ही भारत में परमाणु बम की तकनीक और परमाणु बम अस्तित्व में था. जिस तरह से आज हमारी सेनाओं के पास ब्रह्मोस मिसाइल है, उसी तरह से उस काल में ब्रह्मास्त्र होता था. उस काल के शुद्ध रक्त वाले हमारे आर्य पूर्वज अपने परमाणु बम को ब्रह्मास्त्र कहते थे, इसकी कोई काट होती नहीं थी, जब इसका विस्फोट होता था तो हजारों योजन की परिधि में समस्त जीव जंतु और वृक्ष पौधे जल कर नष्ट हो जाते थे, (योजन उस समय की दूरी नापने के काम आता था जैसे आजकल किलोमीटर होता है).
यह ब्रह्मास्त्र नामक परमाणु बम अन्तरिक्ष में सुरक्षित रखा रहता था, इसको दो मंत्रो के जरिये संचालित करते थे, एक मन्त्र आवाहन का होता था, जिसके पढने मात्र से बम अंतरिक्ष से निकल कर आकाश में उतर आता था, और एक मन्त्र विस्फोट (detonate) के लिए होता था. जमदग्नि पुत्र परशुराम ने यह बम संचालन की विद्या महाभारत के अंगराज कर्ण को सिखाई थी, पर उन्हें शाप दे दिया था, कि जब तुम जीवन के सबसे बड़े संकट में होगे और ब्रह्मास्त्र विस्फोट करना चाहोगे तो विस्फोट करनेवाला मन्त्र भूल जाओगे. अब कल्पना करो कि आप बैंक में एटीएम से पैसे निकालने गए हो, और पिन या पासवर्ड भूल गए तो पैसे कैसे निकलेंगे, नहीं निकलेंगे न. तो अंगराज कर्ण का रथ जब अर्जुन से युद्ध करते हुए कीचड में फंस गया तो उन्होंने ब्रह्मास्त्र (परमाणु बम) फोड़ने की सोची, बम का आवाहन किया पर बम का विस्फोट करते समय वो मन्त्र (पासवर्ड) भूल गए, और अर्जुन ने उनका अपने तीर से वध कर दिया.
बाद में जर्मन लोग भारत आये, उन्होंने हमारे संस्कृत ग्रंथों को अपने देश ले जा के गहन अध्ययन किया, (वे लोग भी हमारे पूर्वजो की तरह गौर वर्ण और शुद्ध आर्य रक्त वाले थे), जर्मन नेता हिटलर ने अपनी प्रयोगशाला बना के वैज्ञानिकों को इस बम बनाने के कार्य में लगा दिया, पर जब द्वितीय विश्व युद्ध चल ही रहा था, जासूसी के जरिये अमेरिका ने उनके बम बनाने के रहस्य जान लिए और अपना बम बना लिया, अमेरिका ने बाद में यही बम हिरोशिमा और नागासाकी नाम के जापानी शहरों पर गिराए. अब विश्व चाहे कुछ भी कहे, बच्चों पर यह कभी न भूलना कि परमाणु बम का अविष्कार महाभारत के बहुत पहले भारत में हो चूका था, अमेरिकी लोग झूठे हैं, वो हमारे धर्मग्रंथों के रहस्यों से वैज्ञानिक आविष्कार कर लेते हैं और अपना पेटेंट करा लेते हैं. उनका क्या है वो हमारे नीम और आम के पेड़ को भी अपना कह देते हैं, उनके बहकावे में आने की आवश्यकता नहीं है, हमारा भारत विश्व-गुरु था, है, और श्रृष्टि के अंत तक रहेगा


अमेरिका 6000 वर्ष पूर्व एक विशाल हिन्दू राष्ट्र था।


लाल देह लाली लसे लेकर हनुमान जी अपने पूरे परिवार के साथ वहां रहा करते थे। उनके वंशज आज भी वहां 'रेड इन्डियन' कहे जाते हैं। वहां की जो पहली राजधानी थी फ़िलाडेल्फिया, उसका नाम हिन्दू राजा के शासन काल में 'फूलनगरिया' था। 
कहते हैं कि वहां हिंदुओं के राज्य में संस्कृति और सभ्यता अपने चरम पर थी, आज के ये वेस्टर्न स्टाइल ट्वायलेट तभी अस्तित्व में आ चुके थे। इस ट्वायलेट का आविष्कार देवर्षि नारद ने अपने सुभीते के लिए किया था क्योंकि वो भारतीय मीडिया की तरह सबसे आगे रहने वाले जीव थे। तो जो समय पूरी तरह बैठ कर उठने में लगता था उसकी बर्बादी से बचने के लिए उन्होंने इसका आविष्कार किया।
और जो ये आज का व्हाइट हाउस देख रहे हैं तब ये राजा का हरम हुआ करता था। राजा को उसकी रानियों का सौंदर्य खुल कर नजर आये इसलिए पूरी इमारत को सफ़ेद चूने से पुतवाया।(अब भी अंग्रेजों ने उसे सफ़ेद रखने के लिए जेके वाल पुट्टी इस्तेमाल की हुई है)
फिर एक दिन वही हुआ जो पूरी दुनिया में होता रहा है। शांतिप्रिय हिंदुओं पर गोरों ने हमला कर दिया। जिन्होंने उनकी दासता स्वीकार कर ली वे रेड इन्डियन बन के वहां रहे बाकी सबको धक्के मार कर निकाल दिया।

आइन्स्टीन में भी शुद्ध आर्य रक्त प्रवाहित होता था


सन 1879 की सर्दियों की बात है । एक गरीब ब्राह्मण के घर एक असाधारण प्रतिभा के बालक ने अवतार लिया । वह बालक जन्म से ही कबीर के बारे में कहे दोहे को सस्वर गाया करता था । गरीब माँ बाप को अपने इस अति प्रतिभाशाली पुत्र को देख कर बहुत ख़ुशी मिलती, परन्तु अपनी दरिद्रता से वे बहुत परेशान रहा करते थे । शुभ मुहूर्त में बालक का नामकरण सम्पन्न हुआ और बड़े प्यार से नाम रखा गया " रामपलट ईश्वरदीन " .
बालक ईश्वरदीन होली के बाद रंग पड़ने से रो रहा था और उसने कुछ ऐसे मन्त्र बोल दिए जिससे उसके ऊपर पड़े सारे रंग गायब हो गए. उसी समय एक यहूदी व्यापारी उधर से गुजरा. उसका कोई पुत्र नहीं था. उसने बालक में छिपी प्रतिभा को पहचान लिया । यहूदी ने गरीब ब्राह्मण से बालक को 2000 स्वर्ण मुद्राओं में खरीद लिया । वही बालक आगे चल कर अलबर्ट आइन्स्टीन कहलाया और उसने बचपन में सीखे दोहे 'मसि कागद छुयो नही...' के आधार पर e=mc2 वाला फार्मूला दिया।
इस प्रकार यह स्थापित होता है की आइन्स्टीन में भी शुद्ध आर्य रक्त प्रवाहित होता था 


सभी को स्मरण रहना चाहिए कि हमने मानव सभ्यता के विकास में विश्वगुरु की भूमिका अदा की है, और आज भी जर्मनी, अमेरिका और जापान हमारी प्राचीन पुस्तकों के सहारे ही नए नए अविष्कार करते हैं, पर वे इतने दुष्ट हैं कि हमें इसका श्रेय नहीं देते हैं। खैर श्रेय से क्या लेना हमें, ज्ञान तो सार्वभौम होता है, सबका होता है और मानवमात्र के कल्याण के लिए होता है। बोलिए जय विश्वगुरु,जम्बूद्वीप। हमें पूर्ण आशा है कि मोदीजी के नेतृत्त्व में एक बार हम लोग फिर से विश्वगुरु बन के रहेंगे, आपका सहयोग अपेक्षित है 
               -  स्त्रोत  फेसबुक : 
https://www.facebook.com/vishwaguru.jamboodwip/


जनवरी 02, 2015

तुम लौट आओ ना कामरेड !

प्यारी कामरेड ,
प्यारी कामरेड , 
             
                       चाहे हर शब्द मेरे हाथों से 
                      तेरी तस्वीर बनकर निकलता है। 
                  जुबान का हर लफ्ज़ मुहँ से तानसेन की मधुर धुन में
                            तेरा ही संगीतमयी नाम लेता है। 

                                     फिर भी 
              इतने फाँसले बढ़ गए हैं तेरे और मेरे बीच 
             कमबख्त न्यूटन का आखरी नियम भी विफल हो चुका है। 
           चाहते हुए भी वक्ती तौर पे आलिंगन कर चूमना नहीं तुझे। 

                       तू समझ रही है ,
                तुझे हासिल करने के लिए 
           अण्डों में चूजे सा मचल रहा हूँ मैं। 
    अन्दर का ज्वारभाटा तूफान का रूप ले रहा है। 

                                                  बहुत भोली है तू 
                                            मोती को भी पत्थर समझ बैठी है। 
                                                   हाँ ये सही है 
                             तुझे मोम की देवी समझने की गुस्ताखी की है मैने। 

          मेरी महबूब , 
     मेरा भी जी करता है 
खोलूँ कोई मुहब्बत का दस्तावेज़ 
   जो मासूम गीतों को कहे 
तुझे मनाने और दिल की सुनाने के लिए। 

                     शायद तुझे अहसास नहीं है कॉमरेड 
                        दफन हो रही उन संवेदनाओं का 
                             लहू का पसीना बहाते हुए 
                          पेट की आग बुझाने में 
             अपने अंगों को चबाने वाले जीवन का। 
 

                             और हाँ ,
          गिददडों , बघियाड़ों और  मगरों के जबड़े तोड़ 
         मुझ सँग संग्राम की नायिका बनना है तुझे।

                                  हाँ ,
                   मैं अपनी हदें पार कर रहा हूँ
                              रोको मत
                 तुम लौट आओ ना कामरेड ! चाहे हर शब्द मेरे हाथों से
तेरी तस्वीर बनकर निकलता है।
जुबान का हर लफ्ज़ मुहँ से तानसेन की मधुर धुन में
तेरा ही संगीतमयी नाम लेता है।

फिर भी
इतने फाँसले बढ़ गए हैं तेरे और मेरे बीच
कमबख्त न्यूटन का आखरी नियम भी विफल हो चुका है।
चाहते हुए भी वक्ती तौर पे आलिंगन कर चूमना नहीं तुझे।
तू समझ रही है ,
तुझे हासिल करने के लिए
अण्डों में चूजे सा मचल रहा हूँ मैं।
अन्दर का ज्वारभाटा तूफान का रूप ले रहा है।
बहुत भोली है तू
मोती को भी पत्थर समझ बैठी है।
हाँ ये सही है
तुझे मोम की देवी समझने की गुस्ताखी की है मैने।
मेरी महबूब ,
मेरा भी जी करता है
खोलूँ कोई मुहब्बत का दस्तावेज़
जो मासूम गीतों को कहे
तुझे मनाने और दिल की सुनाने के लिए।
शायद तुझे अहसास नहीं है कॉमरेड
दफन हो रही उन संवेदनाओं का
लहू का पसीना बहाते हुए
पेट की आग बुझाने में
अपने अंगों को चबाने वाले जीवन का।

और हाँ ,
गिददडों , बघियाड़ों और मगरों के जबड़े तोड़
मुझ सँग संग्राम की नायिका बनना है तुझे।
हाँ ,
मैं अपनी हदें पार कर रहा हूँ
रोको मत
तुम लौट आओ ना कामरेड !

 - रोशन  सुचान
 
 

अगस्त 15, 2011

छात्र आन्दोलन में ए .आई .एस.एफ. के 75 साल और चुनौतियां ....

प्लेटिनम जुबली समारोह ....
जंग- ए आज़ादी में मुख्य रोल निभाया था ए .आई .एस.एफ.  ने .....
शिक्षण संस्थानो को शिक्षाविदों की जगह शराबमाफिया , भूमाफिया , ठेकेदार , राजनेता आदि चला रहे हैं , इन संस्थानों में प्रतिभा की जगह धन का बोलबाला चल रहा है .  अब शिक्षा , रोज़गार , स्वास्थ्य सुविधाएँ ना देने वाली व्यवस्था के विरुद्ध जोरदार छात्र आन्दोलन का बिगुल फूंक देने का समय आ गया है  - रोशन सुचान
लखनऊ  में  एक  बार  फिर  से  इतिहास  ने अपने  आप  को  दोहराया  है .  12-13 अगस्त  को  देश  के  प्रथम छात्र  संगठन  आल  इंडिया  स्टुडेंट्स  फैडरेशन  ने इतिहास  रचते  हुए  अपना  75 वां (   प्लेटिनम जुबली )  स्थापना  दिवस  लखनऊ  के उसी  गंगा  प्रशाद   मेमोरिअल   हाल  में  मनाया ,   जहाँ  12 अगस्त  1936 को  संगठन  की  स्थापना   हुई  थी  . सम्मलेन  में आये  अधिकाँश प्रतिनिधियों को उसी छेदी लाल धर्मशाला मे ठहराया गया ,  जिसमे 1936 मे आए प्रतिनिधि को ठहराया गया था। यह वही धर्मशाला है जिसमे ठहर कर क्रांतिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने अपने साथियों के साथ 'काकोरी' अभियान की रूप-रेखा तैयार की थी। ये दोनों स्थान क्रांतिकारियों की कर्मस्थली रह चुकने के कारण किसी तीर्थ से कम  नहीं हैं।  
गंगा प्रशाद मेमोरिअल हाल के निकट का बाज़ार
उदघाटन भाषण सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्या न्यायाधीश हैदर अब्बास रजा साहब ने दिया जो खुद इस संगठन के कर्मठ नेता रह चुके हैं। अब्बास साहब ने A I S F को मजबूत बनाने के साथ-साथ छात्रों का आह्वान किया कि वे आज शिक्षा पर आए संकट और उस पर बढ़ते बाजारीकरण के प्रभाव को समाप्त करने की दिशा मे जोरदार आंदोलन चलाएं। बाद मे सी. पी. आई . नेता  अतुल  कुमार 'अनजान' ने अपने उद्बोधन मे बताया कि जस्टिस साहब ने अपने छात्र जीवन मे शिक्षा के प्रारम्भ हुये निजीकरण का तीव्र विरोध किया था और आंदोलन का सफल नेतृत्व किया था । 'अनजान' साहब ने यह भी बताया कि उस आंदोलन का नारा था-"यू पी के तीन चोर-मुंशी,गुप्ता,जुगल किशोर"। के एम मुंशी तब गवर्नर थे,चन्द्र्भानु गुप्ता मुख्यमंत्री और जुगल किशोर शिक्षा मंत्री थे। 

छात्र मार्च .......
मंच ...........
  सम्मलेन  को पूर्व छात्र नेता एस सुधाकर रेड्डी  (पूर्व सांसद ), अमरजीत कौर  ने  भी संबोधित किया . 13 अगस्त को "वर्तमान स्थितियों मे छात्रों की भूमिका" विषय पर एक गोष्ठी हुयी जिसमे प्रो .अशोक वर्धन ,प्रो .अली जावेद,राज्य सभा सदस्य का .अजीज पाशा ने प्रकाश डाला और छात्रों का मार्ग-दर्शन किया। ये सभी अपने समय के प्रभावशाली छात्र नेता रहे हैं. संगठन   के  राष्ट्रीय अध्यक्ष परमजीत ढाबां और महासचिव  अभय मनोहर टकसाल ने भविष्य मे शिक्षा विदों के सुझाव पर अमल करने का आश्वासन दिया और  कहा की खुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह के महिमामंडन को रोका जाये जिनकी गवाही सरदार भगत सिंह की फांसी का आधार बनी थी। सम्मेलन मे शिक्षा पर घटते बजट की तीव्र आलोचना की गई और विदेशी विश्वविद्यालयों को खोले जाने की निन्दा कर मजबूत छात्र  आन्दोलन चलाने का आह्वान किया गया ...
प्रदर्शनी .........


दरअसल  ए .आई .एस.एफ. देश का  प्रथम छात्र   संगटन है , साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन के दोरान  12 अगस्त 1936 को लखनऊ के गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल'में  ए .आई .एस.एफ. का  गठन हुआ था . सम्मेलन में 936 प्रतिनिधियों  ने भाग लिया था , जिसमें 200 स्थानीय और शेष 11 प्रांतीय संगठनों के प्रतिनिधि थे .  तब पंडित  जवाहर  लाल  नेहरु  ने  सम्मलेन  की  अध्यक्षता   की  थी , तो  मुहमद  अली  जिन्नाह  मुख्य अतिथि थे . जो  बाद  में  हिंदुस्तान  और  पाकिस्तान  के  प्रधान  मंत्री  बने  .
नेहरु-जिन्ना : सम्मेलन में
मोलाना  आज़ाद  और  प्रेम  नारायण  भार्गव  भी  स्थापना  दिवस   पर  मुख्य   रूप से  हाज़िर  थे  , जबकि  महात्मा गाँधी  , गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर , गफ्फार  खान  , सरोजनी  नायडू  सर तेज बहादुर सप्रू और श्रीनिवास शास्त्री सहित  देश  भर  के राष्ट्रीय  नेताओं  ने सम्मेलन  के  नाम  अपना  शुभकामना  सन्देश  भेजे . भगत सिंह , राजगुरु,सुखदेव के साथी भी इस संगठन के सदस्य रहे. प्रथम महामंत्री लखनऊ के ही प्रेम नारायण भार्गव चुने गए और अध्यक्ष पं.जवाहर लाल नेहरू  . अपने उद्घाटन भाषण में जवाहर लाल नेहरू ने तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियांे का विश्लेषण करते हुए छात्रों से आजादी का परचम उठाने का आह्वान किया.  इसके अलावा अपने अध्यक्षीय भाषण में जिन्ना ने भी इस बात की खुशी जाहिर की कि देश के अलग-अलग जाति और समुदाय के लोग आज यहाँ पर एक साझे मकसद के लिए एकत्र हुए हैं .   

 
पटना में गोलियों से शहीद एआईएसएफ के छात्रों का स्मारक
   छात्र  संगठन  के  नेतृत्व  में छात्रों -  युवायों  ने  न  सिर्फ  1936 से  1947 तक  देश को  ब्रिटिश  उपनिवेशवाद  से  आज़ाद  करवाने  में  मुख्या  भूमिका  निभाई  , बल्कि  आज़ादी  के  बाद  भी  देश  भर  के  छात्रों  को सम्मानजनक  अधिकार  के इलावा  18 साल  की  उम्र  में  मतदान   का  अधिकार  , बस  पास  की  सुविधा  , शिक्षा  सम्बन्धी  अधिकार  , संस्थानों  का जनवादीकरण  , रोज़गार के  मसले  पर  सरकारों  से  आन्दोलन  कर बेरोज़गारी भत्ता  दिलवाने  में क्रन्तिकारी योगदान  दिया  है  . 

बढ़ रहे अरबपति
छात्र  आन्दोलन  के  इतिहास  में  75 वर्ष  पूरे  होने  पर  जहां  जश्न  मनाने  के  लिए  गोरव्शाली इतिहास  है  , वहीं  दूसरी  तरफ  पूंजीवाद के  पोषक  केंद्र  और  राज्ये  सरकारों  की  छात्र  विरोधी  नीतियों  के  कारण  देश  भर  के  छात्र  संकट  के  दौर  से  गुज़र  रहे  हैं  . यू पी ए-  दो  ने  शिक्षा  के क्षेत्र   को  भी  बाजारू  ताकतों के हवाले  कर  शिक्षा  में  अघोषित  आपातकाल  लागू  कर  दिया  है . ऐसे  दौर  में  जब  महंगाई   इतनी  हद  से  ज्यादा  बढ़ चुकी  है  की   देश  के  78 करोड़  लोग  20 रूपये  प्रतिदिन  पर  गुज़ारा  कर  रहे  हैं  , तो  निजी  शिक्षण  संस्थान  छात्रों  और  अभिभावकों  से  मोटा  पैसा  वसूल रहे हैं  , इन  संस्थानों  में  प्रतिभा  की जगह  धन  का  बोलबाला  चल  रहा  है  . भारत  जैसे  विशाल  देश के  लिए  3 फीसदी  शिक्षा  का  बज़ट  अपर्याप्त  एवं  असंतोषजनक  है  . करोड़ों बच्चे  पढ़ने  की उम्र  में  गेराज  , होटल  , कारखानों  , एवं  घरेलू  काम में  अपने  बचपन  की कहानी  गढ़  रहे  हैं  . दूसरी  तरफ सरकार  ने  शिक्षा  को  चंद  देशी -विदेशी  मुनाफाखोरों  के  हवाले  कर  दिया  है  , जो  शिक्षा  की दुकानें  लगाकर  अवाम  के  खून  पसीने  की  कमाई  को हड़प  रहे  हैं  . 

शिक्षा संस्थाय़ें अब शिक्षा मंदिर नहीं रहीं , अब तो ये  एजूकेशनल शोप्स हैं ?? ये शिक्षकों के रेस्ट  हाउसिज हैं और शिक्षकों के घर शिक्षा की आढतें ? टयूशन नक़ल करने का बीमा और पास कराने की गारंटी  है ?? जाति और धर्म की राजनीति  करने वाले नेता हैं इनके मालिक ?   राजनैतिक अखाड़े भी हैं और मुनाफा देने वाला व्यापार भी ? जातिवाद और सांप्रदायिकता के बीज इसी उपजाऊ भूमि में अंकुरित और पल्वित होकर सड़कों पर आते हैं .शिक्षा संस्थाएं तो ऐसे कारखाने बनने चाहीएँ थे , जहाँ बेहतर इंसान बनते ?? सरकार  ने  अपनी  जिम्मेदारी  से  भागकर  अमीरजादों  की  तिजोरियों  और  तोंदों  को  मोटा  करने  के  लिए  लुटेरों  के  आगे  आत्मसमर्पण  कर  दिया  है  और  अब धन  की  कमी  का  रोना  रोकर  विदेशी  पूंजी  को  भी  शिक्षा  में  निवेश  करने  के  लिए  आमंत्रित  करने  जा  रही  है  , जिससे  विदेशी  निजी  विश्वविद्यालयों  के  रास्ते खुल  जायेंगे  . वहीं  11 लाख  करोड़ के बज़ट  में  से  5 लाख  करोड़  रूपये  कारपोरेट  जगत  को  तमाम  छूटों  और  रियाएतों  की   शकल  में  दिए  जा  रहे  हैं  . 


 ब्रिटेन से देश की  यू. पी .ए .सरकार को सीख लेनी चाहिए , जहां विश्वविद्यालयों की ऊंची फ़ीस चुकाने के लिए विद्यार्थी देह व्यापार करने से लेकर पोर्न फिल्मों में काम करने को मजबूर हो रहे हैं. बी.बी.सी की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के किंग्स्टन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रान रोबर्ट्स के सर्वेक्षण में एक चौंकानेवाला तथ्य सामने आया है कि ब्रिटेन में उच्च शिक्षा के भारी खर्चों को उठाने के लिए लगभग 25 फीसदी विद्यार्थियों को देह व्यापार में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. ब्रिटेन ही नहीं, अमेरिका में भी हालात कुछ खास बेहतर नहीं हैं. अमेरिकी कालेज बोर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में स्नातक की डिग्री हासिल करनेवाले दो-तिहाई छात्रों पर औसतन 20 हजार डालर का शिक्षा कर्ज होता है जबकि उनमें से 10 फीसदी 40 हजार डालर से अधिक के कर्ज में डूबे होते हैं.  अमेरिका और ब्रिटेन ही नहीं, अधिकांश विकसित पूंजीवादी देशों में लगातार महंगी होती उच्च शिक्षा आम विद्यार्थियों के बूते से बाहर होती जा रही है. यह भारत जैसे विकासशील देशों के लिए एक सबक है जहां सरकार और नीति-निर्माताओं को लगता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उनकी सभी समस्याओं का हल अमेरिकी और पश्चिमी उच्च शिक्षा व्यवस्था की आंख मूंदकर नक़ल करना हैं
शिक्षण  संस्थानो को  शिक्षाविदों  की  जगह   शराबमाफिया    , भूमाफिया  , ठेकेदार , राजनेता  आदि  चला  रहे  हैं  , जिनका  शिक्षा  से  दूर  दूर  तक  कोई  वास्ता नहीं  . सरकार   और  प्रशाशन  की  मिलीभगत   के  कारण  6-14 वर्ष  के  बच्चों  को  निजी  स्कूलों  में  मुफ्त  शिक्षा  का  मोलिक  अधिकार  कागज़ी  बनकर  रह  गया  है  , सुप्रीम  कोर्ट  के  निर्देशों  के  बावजूद  केंद्र  और  राज्ये  सरकारें  एक  दूसरे  पर  जवाबदेही  डालकर  भाग  रही  हैं  . 

छात्र  संघ  के  चुनावों का  जनतांत्रिक   अधिकार  जो  लम्बी  लड़ाई  द्वारा  प्राप्त  किये  गये थे  , लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों  के बावजूद सरकारें  उनको  ठेंगा  दिखा  रही   हैं  . देश के अधिकांश राज्यों के विश्वविद्यालयों और कालेजों में छात्रसंघ के चुनाव नहीं हो रहे हैं. यहां तक कि केंद्र सरकार द्वारा लिंगदोह समिति की सिफारिशों को लागू करने और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद अधिकांश राज्य सरकारों और विश्वविद्यालय प्रशासनों की छात्रसंघ बहाल करने और उनका चुनाव कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही है. उनका आरोप है कि छात्रसंघ परिसरों में गुंडागर्दी, अराजकता, तोड़फोड़, जातिवाद, क्षेत्रवाद और अशैक्षणिक गतिविधियों के केन्द्र बन जाते हैं जिससे पढाई-लिखाई के माहौल पर असर पड़ता है. उनकी यह भी शिकायत है कि इससे परिसरों में राजनीतिकरण बढ़ता है जिसके कारण छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों में गुटबंदी, खींच-तान और संघर्ष शुरू हो जाता है जो शैक्षणिक वातावरण को बिगाड़ देता है.  ऐसा नहीं है कि इन आरोपों और शिकायतों में दम नहीं है. निश्चय ही, पिछले कुछ दशकों में छात्र राजनीति से समाज और व्यवस्था में बदलाव के सपनों, आदर्शों, विचारों और संघर्षों के कमजोर पड़ने के साथ अपराधीकरण, ठेकेदारीकरण, अवसरवादीकरण और साम्प्रदायिकीकरण का बोलबाला बढ़ा है और उसके कारण छात्रसंघों का भी पतन हुआ है. इससे आम छात्रों की छात्रसंघों और छात्र राजनीति से अरुचि भी बढ़ी है. इस सच्चाई को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि अधिकांश परिसरों में इन्हीं कारणों से आम छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी छात्र राजनीति और छात्रसंघों के खिलाफ हो गए हैं. विश्वविद्यालयों के अधिकारियों ने इसका ही फायदा उठाकर परिसरों में छात्र राजनीति और छात्रसंघों को खत्म कर दिया है. लेकिन सवाल यह है कि छात्र राजनीति और छात्रसंघों के यह पतन क्यों और कैसे हुआ और उसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या इसमें मोरल हाई ग्राउंड लेनेवाले राजनेताओं, अफसरों और विश्वविद्यालयों के अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं है?


सच यह है कि छात्र राजनीति को भ्रष्ट, अवसरवादी, विचारहीन और गुंडागर्दी का अखाडा बनाने की सबसे अधिक जिम्मेदारी कांग्रेस, भाजपा और मुख्यधारा के अन्य राजनीतिक दलों के जेबी छात्र संगठनों- एन.एस.यू.आई, ए.बी.वी.पी, छात्र सभा, छात्र जनता आदि की है. असल में, वे इसलिए सफल हुए क्योंकि छात्र राजनीति के एजेंडे से जब बड़े सपने, लक्ष्य, आदर्श, विचार और संघर्ष गायब हो गए तो छात्र संगठनों और छात्र नेताओं को भ्रष्ट बनाना आसान हो गया. लेकिन ऐसा नहीं है कि छात्रसंघों के खत्म हो जाने के बावजूद परिसरों में रामराज्य आ गया है. यहां यह कहना जरूरी है कि परिसरों में छात्र राजनीति और छात्रसंघों का होना न सिर्फ जरूरी है बल्कि इसे संसद से कानून पारित करके अनिवार्य किया जाना चाहिए. आखिर विश्वविद्यालयों और कालेजों के संचालन में छात्रों की भागीदारी क्यों नहीं होनी चाहिए? दूसरे, छात्रों के राजनीतिक प्रशिक्षण में बुराई क्या है? क्या उन्हें देश-समाज के क्रियाकलापों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए?


वास्तव में, आज अगर विश्वविद्यालयों डिग्रियां बांटने का केन्द्र बनाने के बजाय देश में बदलाव और शैक्षणिक पुनर्जागरण का केंद्र बनाना है तो उसकी पहली शर्त परिसरों का लोकतंत्रीकरण है. इसका मतलब सिर्फ छात्रसंघ की बहाली नहीं बल्कि विश्वविद्यालय के सभी नीति-निर्णयों में भागीदारी है. इसके लिए जरूरी है कि सिर्फ शिक्षकों और कर्मचारियों ही नहीं, छात्रों को भी विश्वविद्यालय के नीति निर्णय करनेवाले सभी निकायों में पर्याप्त हिस्सेदारी दी जाए. आखिर विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक बेहतरी में सबसे ज्यादा स्टेक और हित छात्रों के हैं, इसलिए उनके संचालन में छात्रों की भागीदारी सबसे अधिक होनी चाहिए. इससे परिसरों के संचालन की मौजूदा भ्रष्ट नौकरशाह व्यवस्था की जगह पारदर्शी, उत्तरदायित्वपूर्ण और भागीदारी आधारित व्यवस्था बन सकेगी. जैसाकि भारतीय पुनर्जागरण के कविगुरु टैगोर ने कहा था, “जहां दिमाग बिना भय के हो, जहां सिर ऊँचा हो, जहां ज्ञान मुक्त...उसी स्वतंत्रता के स्वर्ग में, मेरे प्रभु मेरा देश (या विश्वविद्यालय) आँखें खोले.” इस स्वतंत्रता के बिना परिसरों में सिर्फ पैसा झोंकने या उन्हें पुलिस चौकी बनाने या विदेशी विश्वविद्यालयों के सुपुर्द करने से बात नहीं बननेवाली नहीं है. साफ है कि छात्रसंघों और छात्र राजनीति का विरोध वास्तव में, न सिर्फ अलोकतांत्रिक बल्कि तानाशाही की वकालत है.



वहीं  इतनी  महंगी  शिक्षा  के  बावजूद युवा  हाथों  में  डिग्रियां  लेकर  खून  के  आंसू रो  रहे  हैं  , उन्हें  प्रबंध  द्वारा  काम  नहीं  दिया  जा  रहा  है . बेरोज़गारी  सुरसा के मुहं की तरह बढ़ रही  है  . देश  भर  में  26 करोड़  युवा  बेरोजगार  हैं  . शहरों   के  कुल  युवाओं  में  से  60 फीसदी  और  गांवों  में  45 फीसदी  बरोजगारी  है  . शहरी  भारत  में  हर  साल   1 करोड़  नयें  बरोजगार  जुड़ते  हैं  , जो  काम की  तलाश  में  रहते हैं  . यू पी ए सरकार  ने  रोज़गार  देने  की  बजाए  1 करोड़  लोगों  को  काम से  बाहर  का रास्ता   दिखा  दिया  है  , जिससे  युवा  ही  नहीं  पूरा  मेहनतकश  वर्ग  ही  निराशा  के  दौर  से  गुज़र  कर   तनाव  , नशा  और  आत्महत्या  की  अंधी  खाई  की  और   अग्रसर  नज़र  आ  रहा  है  . उसे  अपनी  समस्याओं   का  कोई  समाधान  नज़र  नहीं  आ  रहा  , ऐसे परिस्थियों  में  जब  एआईएसऍफ़   अपना  75   वां  स्थापना  दिवस मना  रहा  है  तो  शिक्षा  , रोज़गार  , स्वास्थ्य   सुविधाएँ ना  देने  वाली  व्यवस्था  के विरुद्ध  छात्र  आन्दोलन  का  बिगुल  फूंक  देने  का  समय  आ  गया  है  . इस दौर में शासक वर्गों की ओर से युवाओं को बदलाव की चेतना और आन्दोलनों से दूर रखने और इन आन्दोलनों को कमजोर करने की योजनाबद्ध कोशिश हुई है और कहना पड़ेगा कि उन्हें काफी हद तक कामयाबी भी मिली है. भारतीय शासक वर्ग को मालूम है कि दुनिया के जिस देश में भी उसकी ५० फीसदी से अधिक आबादी २५ साल से कम की हुई है, वहां सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल और परिवर्तनों की लहर को रोकना असंभव हो गया है.



सो ये  वक़्त  छात्रों  - युवाओं  के  जागने  का  वक्त  है  . समाज  में  व्याप्त  गैरबराबरी , नाइंसाफी  को  चुपचाप  देखते  रहने  की  बजाए भगत सिंह के रास्ते  फिर  से  शिक्षा  और  रोज़गार  के  मसले  पर  जुझारू  संघर्ष  करने  का  इतिहास इंतज़ार  कर  रहा है ...........
- रोशन सुचान

अगस्त 09, 2011

भारतीय आज़ादी आंदोलन मे युवा/छात्रों का योगदान .....

देश के लिए मर मिटने वाले छात्रों- युवाओं की याद में .......
पटना में गोलियों से शहीद एआईएसएफ के छात्रों का स्मारक

1922 ई .मे गांधी जी द्वारा चौरी-चौरा कांड के नाम पर असहयोग आंदोलन वापिस लेने पर युवा/छात्र क्रान्ति की ओर मुड़े । क्रांतिकारी आंदोलन को चलाने और बम आदि बनाने हेतु काफी धन की आवश्यकता थी। अतः राम प्रसाद 'बिस्मिल'/चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व मे क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना कब्जे मे लेने की योजना बनाई। 09 अगस्त 1925 की रात्रि लखनऊ के 'काकोरी'रेलवे स्टेशन पर पेसेंजर गाड़ी के गार्ड से खजाने को हस्तगत किया गया। आज इस घटना को हुये 86 वर्ष पूर्ण हो गए हैं।


इस क्रांतिकारी घटना मे भाग लेने वाले स्वातंत्र्य योद्धाओं मे राम प्रसाद 'बिस्मिल',अशफाक़ उल्ला खान ,रोशन सिंह तथा राजेन्द्र सिंह लाहिड़ी को 17 एवं 19 दिसंबर 1927 को ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दी। बिस्मिल उस समय शाहजहाँपुर के मिशन स्कूल मे नौवी कक्षा के छात्र थे। वह पढ़ाई कम और आंदोलनों मे अधिक भाग लेते थे। गोरा ईसाई हेड मास्टर भी उनका बचाव करता था। एक बार जब वह कक्षा मे थे तो ब्रिटिश पुलिस उन्हें पकड़ने पहुँच गई। उस हेड मास्टर ने पुलिस को उलझा कर कक्षा अध्यापक से राम प्रसाद''बिस्मिल' को रेजिस्टर  मे गैर-हाजिर करवाया और भागने का संदेश दिया। बिस्मिल दूसरी मंजिल से खिड़की के सहारे कूद कर भाग गए और पुलिस चेकिंग करके बैरंग लौट गई। लेकिन खजाना कांड मे फांसी की सजा ने हमारा यह होनहार क्रांतिकारी छीन लिया। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क मे पुलिस से घिरने पर चंद्रशेखर 'आजाद'ने भी खुद कोअपनी ही पिस्तौल की गोली से  शहीद कर लिया। 


होनहार युवा/छात्रों ने आजादी की मशाल को थामे रखा जब 08 अगस्त 1942 को गांधी जी के आह्वान पर 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पास किया गया था। लगभग सभी बड़े नेता ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए थे। इस दशा मे सम्पूर्ण आंदोलन युवाओं और छात्रों द्वारा संचालित किया गया था। 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय से यूनियन जेक को उतार कर तिरंगा छात्रों ने फहरा दिया था किन्तु सभी सातों छात्र ब्रिटिश पुलिस की गोलियों से शहीद हो गए थे। उनकी स्मृति मे वहाँ उनकी प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। इस अभियान का नेतृत्व राजेन्द्र सिंह जी ने किया था और सबसे आगे उन्हीं की मूर्ती है। इस अभियान के संबंध मे श्री अजय प्रकाश ने एक लेख  लिखा था जो 18 जनवरी 1987 को प्रकाशित -'पटना हाईस्कूल भूतपूर्व छात्र संघ' की 'स्मारिका' मे छ्पा था ,आप भी उसकी स्कैन कापी देख सकते हैं-
(बड़े अक्षरों मे पढ़ने हेतु डबल क्लिक करें)






उसी स्मारिका मे छपा यह लेख आज भी छात्रों/युवाओं के महत्व को रेखांकित करता है-










'लोकसंघर्ष' मे प्रकाशित महेश राठी साहब के एक महत्वपूर्ण लेख द्वारा बताया गया है कि,"आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन का बेहद गौरवमयी और प्रेरणापरद हिस्सा है। ए .आई .एस .एफ .भारतीय स्वाधीनता संग्राम का वह भाग है जिसके माध्यम से देश के छात्र समुदाय ने आजादी की लड़ाई मे अपने संघर्षों और योगदान की अविस्मरणीय कथा लिखी"। 


राठी साहब ने बताया है कि,भारतीय छात्र आंदोलन का संगठित रूप 1828 मे सबसे पहले कलकत्ता मे 'एकेडेमिक एसोसिएशन'के नाम से दिखाई दिया जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियो द्वारा की गई । 1840 से 1860 के मध्य 'यंग बंगाल मूवमेंट'के रूप मे दूसरा संगठित प्रयास हुआ। 1848 मे दादा भाई नौरोजी की पहल पर मुंबई मे 'स्टूडेंट्स लिटरेरी और सायींटिफ़िक सोसाइटी '
की स्थापना हुयी। कलकत्ता के आनंद मोहन बॉस और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा 1876 मे 'स्टूडेंट्स एसोसिएशन'की स्थापना हुयी जिसने 1885 मे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना मे महती भूमिका अदा की। 16 अक्तूबर 1905 मे बंगाल विभाजन के बाद छात्रों एवं युवाओं ने जबर्दस्त आंदोलन चलाया जिसमे आम जनता का भी सहयोग रहा।


1906 मे राजेन्द्र प्रसाद जी (जो पहले राष्ट्रपति बने थे) की पहल पर 'बिहारी स्टूडेंट्स सेंट्रल एसोसिएशन'की स्थापना हुयी जिसने बनारस से कलकत्ता तक अपनी शाखाएँ खोली और 1908 मे बिहार मे इसी संगठन के बल पर कांग्रेस की स्थापना हुयी। श्रीमती एनी बेसेंट ने 1908 मे 'सेंट्रल हिन्दू कालेज'नामक पत्रिका मे एक अखिल भारतीय छात्र संगठन बनाने का विचार प्रस्तुत किया।


25-12-1920 को नागपूर मे आल इंडिया कालेज स्टूडेंट्स कान्फरेंस का आरंभ हुआ जिसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष आर .जे .गोखले थे। इसका उदघाटन लाला लाजपत राय ने किया था। 1920 से 1935 तक देश मे बड़े स्तर पर विद्यालयों  और महा विद्यालयों की स्थापना हुयी। आजादी के संघर्ष मे छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही थी।


26 मार्च 1931 को कराची मे जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता मे एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमे देश भर से 700 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 23 जनवरी 1936 को यू .पी .विश्वविद्यालय छात्र फेडरेशन ने अपनी कार्यकारिणी मे अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन बुलाने का निर्णय लिया। पी .एन .भार्गव की अध्यक्षता मे एक स्वागत समिति का गठन किया गया जिसने देश के सभी छात्र संगठनों तथा कांग्रेस,सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी सहित सभी राजनीतिक धड़ों से संपर्क बनाया।


12-13 अगस्त 1936 को लखनऊ मे -सर गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल मे भगत सिंह के विचारों और रुसी क्रांति से  प्रेरित  A I S F का स्थापना सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमे 936 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिसमे से 200 स्थानीय और शेष 11 प्रांतीय संगठनों के प्रतिनिधि थे। सम्मेलन मे महात्मा गांधी,रवीन्द्रनाथ टैगोर,सर तेज बहादुर सप्रू और श्री निवास शास्त्री सरीखे गणमान्य व्यक्तियों के बधाई संदेश भी प्राप्त हुये। सम्मेलन का उदघाटन जवाहर लाल नेहरू ने किया।


A I S F के स्थापना सम्मेलन मे पी .एन .भार्गव पहले महा सचिव निर्वाचित हुये । 'स्टूडेंट्स ट्रिब्यून'इसका पहला आधिकारिक मुख पत्र था। 22-11-1936 को लाहौर मे दूसरा सम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता शरत चंद बॉस ने की और उसमे 150 लोगों ने भाग लिया। इसमे छात्रों का एक मांग पत्र भी तैयार हुआ।


आजादी के आंदोलन मे सक्रिय और महत्वपूर्ण भाग लेने वाला यह संगठन आगामी 12-13 अगस्त 2011 को लखनऊ के उसी गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल मे अपनी प्लेटिनम जुबली मनाने जा रहा है जिसका खुला निमंत्रण A I S F की ओर से जारी किया गया है ............