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मई 05, 2011

फ्रेडरिक एंगेल्स की नजरों में 1857 का दिल्ली दखल


उस सम्मिलित शोरगुल में हम नहीं शामिल होंगे जिसके द्वारा उन सैनिकों की बहादुरी की तारीफ में, जिन्होंने हमला करके दिल्ली पर कब्जा कर लिया है, इस समय ब्रिटेन में जमीन-आसमान एक किया जा रहा है। आत्म-प्रशंसा के मामले में अंगरेजों का मुकाबला कोई भी कौम नहीं कर सकतीयहां तक कि फ्रांसीसी कौम भी नहीं, खास तौर से जब सवाल बहादुरी का हो। लेकिन सौ में से निन्यान्वे बार, तथ्यों का विश्लेषण होते ही, उनके शौर्य की समस्त वैभवपूर्ण कहानी एक अत्यंत साधारण घटना रह जाती है। हर समझदार व्यक्ति को उस ढंग से नफरत होगी जिससे ये अंगरेज बुजुर्गजो आराम से अपने घरों में रहते हैं और ऐसी हर चीज से पल्ला छुड़ाकर जोरों से दूर भागते हैं जिसमें सैनिक गौरव प्राप्त करने की दूर की भी संभावना होदूसरों के शौर्य का व्यापार करते हैं। वे यह दिखलाने की कोशिश कर रहे हैं कि दिल्ली के आक्रमण के समय जो पराक्रम दिखलाया गया था, उसमें उनका भी हाथ था। दिल्ली में जो पराक्रम दिखलाया गया, वह बड़ा जरूर थालेकिन किसी भी रूप में असाधारण नहीं था।
दिल्ली की तुलना अगर हम सेवास्तोपोल के साथ करें तो निस्संदेह हम सहमत होंगे कि हिंदुस्तानी सिपाही रूसियों की तरह नहीं थे; ब्रिटिश छावनी के खिलाफ उनका एक भी हमला इंकरमैन के हमलों की तरह का नहीं था; दिल्ली में टोटलेबेन जैसा कोई नहीं था; और, हिंदुस्तानी सिपाही जो व्यक्तिगत और कंपनी दोनों ही दृष्टि से अधिकतर मामलों में बहादुरी से लड़े थेएकदम नेतृत्वविहीन थे। न केवल उनके ब्रिगेडों और डिवीजनों का, बल्कि उनके बटैलियनों तक का कोई नेतृत्व नहीं था; इसलिए उनकी एकता कंपनियों की संगठित शक्ति से आगे नहीं जाती थी। उनमें उस वैज्ञानिक तत्व का एकदम अभाव था जिसके बिना कोई भी फौज आजकल असहाय होती है और किसी शहर की रक्षा का काम
सर्वथा निराशापूर्ण कार्य बन जाता है। फिर भी, संख्या और लड़ाई के उनके साधनों में जो अंतर था, जलवायु का मुकाबला करने की यूरोपियनों की अपेक्षा देशी सिपाहियों में जो अधिक क्षमता थी, दिल्ली के सामने पड़ी (अंगरेजी) फौजें कभी-कभी जिस अत्यंत कमजोर स्थिति में पहुंच जाती थींइस सबकी वजह से दोनों घेरों का, सेवास्तोपोल और दिल्ली के घेरों का, बहुत सा अंतर मिट जाता है और उनकी तुलना करना संभव हो जाता है। (इन कार्रवाइयों को घेरे कहना कैसा विचित्र लगता है!) हमला करके दिल्ली पर कब्जा करने के काम को हम असाधारण, अथवा अनोखे पराक्रम का काम नहीं मानतेयद्यपि यह सही है कि हर लड़ाई की भांति यहां भी व्यक्तिगत पराक्रम के कार्य निस्सदेह दोनों ही तरफ देखने को मिले थे। लेकिन इस बात को हम मानते हैं कि अंगरेजी फौजों की सेवास्तोपोल और बलकलावा के दरम्यान की अग्नि-परीक्षा की तुलना में, दिल्ली के सामने की एंग्लो-इंडियन फौजों ने कहीं अधिक लगन, चारित्रिक शक्ति, विवेक और कौशल का परिचय दिया है। इंकरमैन की घटना के बाद, रूस गई हुई अंगरेजी सेनाएं जहाजों पर बैठकर वापस लौटने के लिए तैयार और राजी थीं और बीच में अगर फ्रांसीसी न आ गए होते, तो निस्संदेह वे लौट आई होतीं। लेकिन, भारत में मौसम, उससे उत्पन्न होने वाली भयानक बीमारियां, संचार के साधनों की गड़बड़ियां, कहीं से जल्दी सैनिक सहायता आने की तमाम संभावनाओं का अभाव, संपूर्ण उत्तर भारत की हालतये सारी चीजें उनसे कहती थीं कि 'वापस चले जाओ!' और अंगरेजी फौजों ने इस कदम की उपादेयता पर विचार तो किया; लेकिन, इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद, अपने मोर्चे पर वे डटी रहीं।
विप्लव जब अपने शिखर पर था, तब सबसे पहले जिस चीज की जरूरत थी, वह यह थी कि उत्तर भारत में एक द्रुतगामी सेना हो। केवल दो ही फौजें थीं, जिनका इस तरह से इस्तेमाल किया जा सकता था : हैवलॉक की छोटी सी फौज, जो जल्दी ही नाकाफी साबित हो गई थी, और वह फौज जो दिल्ली के सामने पड़ी हुई थी। ऐसी हालात में यह निर्विवाद है कि दिल्ली के सामने पड़े रहना और एक अभेद्य शत्रु के साथ व्यर्थ की लड़ाइयां करके अपनी शक्ति गंवाना एक सैनिक गलती थी। एक जगह निठल्ले पड़े रहने की जगह अगर वह फौज चलती-फिरती रहती, तो वह चार गुना अधिक उपयोगी होती। अगर वह गतिशील रहती तो दिल्ली को छोड़कर, उत्तर भारत को साफ कर लिया जा सकता था, और संचार मार्गों की फिर स्थापना हो जाती। अपनी शक्तियों को एक जगह इकट्ठा करने की विद्रोहियों की प्रत्येक कोशिश को असफल बना दिया गया होता, और, इस सबकी वजह से, एक स्वाभाविक और सरल परिणाम के रूप में, फिर दिल्ली का भी पतन हो जाता। यह सब निर्विवाद है। लेकिन राजनीतिक कारणों की मांग थी कि दिल्ली के सामने जो फौजी पड़ाव डाला गया था उसे न उठाया जाए। दोष हेडक्वार्टर (सदर दफ्तर) के उन लालबुझक्कड़ों को दिया जाना चाहिए, जिन्होंने फौज को दिल्ली भेजा था, न कि सेना की उस दृढ़ता को जो एक बार वहां पहुंच जाने के बाद उसने दिखलाई थी। साथ ही साथ, हमें यह बताना भी
नहीं भूलना चाहिए कि वर्षा ऋतु का इस फौज पर जितना असर पड़ने की आशंका थी, उससे कहीं कम असर उस पर पड़ा था। ऐसे मौसम में, सक्रिय सैनिक कार्रवाइयों के परिणामस्वरूप, आम तौर से जैसी बीमारियां फैलती हैं, अगर उनके आसपास की मात्रा में भी वहां वे फैली होतीं तो उस फौज का वापस हट आना, अथवा एकदम भंग हो जाना अपरिहार्य बन जाता। फौज की यह खतरनाक स्थिति अगस्त के अंत तक चलती रही थी। फिर इधर सैनिक सहायता आने लगी, और उधर विद्रोहियों के शिविर के आपसी झगड़े उन्हें कमजोर करते रहे। सितंबर के आरंभ में घेरे वाली गाड़ी आ गई और सुरक्षात्मक स्थिति आक्रमण की स्थिति में बदल गई। 7 सितंबर को पहली बैटरी (तोपखाने) ने गोलाबारी शुरू की और 13 तारीख की शाम को, काम में आने लायक दो दरारें (परकोटे में) पैदा हो गईं। अब हम देखें कि इस दरम्यान क्या हुआ था।
इस संबंध में अगर हम जनरल विल्सन द्वारा भेजी गई सरकारी रिपोर्ट पर भरोसा करेंगे, तो सचमुच भारी गलती के शिकार हो जाएंगे। यह रिपोर्ट लगभग उसी तरह से भ्रामक है जिस तरह क्रीमिया के अंगरेजों के सदर दफ्तर से जारी की जाने वाली दस्तावेजें सदा ही भ्रामक हुआ करती थीं। उस रिपोर्ट से कोई भी इनसान यह नहीं जान सकता कि वे दोनों दरारें कहां हैं, न कोई यही जान सकता है कि हमला करने वाली सेनाओं की क्या सापेक्ष स्थिति है और (मोर्चे पर) वे किस क्रम से लगाई गई हैं। जहां तक लोगों की निजी रिपोर्टों की बात है, तो निस्संदेह वे और भी अधिक भ्रामक हैं। लेकिन, सौभाग्य से, इंजीनियरों और तोपखाने की बंगाल टुकड़ी के एक सदस्य ने जो कुछ हुआ था, उसकी एक रिपोर्ट बंबई गजट में दी है। यह रिपोर्ट उतनी ही स्पष्ट और कामकाजी है जितनी वह सीधी-सादी और अहंकाररहित है। यह अफसर भी उन कुशल वैज्ञानिक अधिकारियों में से एक है जिन्हें सफलता का प्राय: संपूर्ण श्रेय दिया जाना चाहिए। क्रीमिया के पूरे युध्दकाल में एक भी ऐसा अंगरेज अफसर नहीं मिल सका था जो इतनी समझदारी की रिपोर्ट लिख सकता जितनी यह है। दुर्भाग्य से यह अफसर हमले के पहले ही दिन घायल हो गया और फिर उसका पत्र वहीं खतम हो गया। इसलिए, उसके बाद की घटनाओं के संबंध में हम अब भी बिलकुल अंधकार में हैं।
अंगरेजों ने दिल्ली की सुरक्षा की इतनी मजबूत व्यवस्था कर ली थी कि कोई भी एशियाई सेना घेरा डालती, तो वे उसका मुकाबला कर लेते। हमारी आधुनिक धारणाओं के अनुसार, दिल्ली को मुश्किल से ही किला कहा जा सकता है, उसे बस एक ऐसी जगह कहा जा सकता है जो किसी फील्ड सेना (सफरी सेना) के हमले का मुकाबला कर सकती है। उसकी पक्की दीवाल (फसील) 16 फुट ऊंची और 12 फुट चौड़ी है, उससे ऊपर 3 फुट मोटा और 8 फुट ऊंचा कमरकोटा है। कमरकोटे के अलावा, उसकी 6 फुट दीवाल खुली हुई है उसके नीचे ढाल भी नहीं है जिससे उसकी रक्षा हो सके। उस पर सीधे-सीधे गोलाबारी की जा सकती है। इस पक्के प्राचीर के संकरेपन की वजह से उसके बुर्जों और
मारटेलो लाठों (रूड्डह्मह्लद्गद्यद्यश ञ्जश2द्गह्मह्य) के अलावा और कहीं तोपों को रख पाना भी असंभव है। ये बुर्ज और लाठें फसील का बचाव करती थीं, लेकिन बहुत ही कम। इस 3 फुट मोटे पक्के कमरकोटे को घेरा डालने वाली तोपों के जरिए आसानी से तोड़ डाला जा सकता है (फील्ड की तोपों से भी ऐसा किया जा सकता है)। इसलिए बचाव करने वालों की तोपों को, और खास तौर से खाई के पाश्र्वों पर लगी हुई तोपों को खामोश कर देना बहुत आसान था। फसील और खाई के बीच आगे निकला हुआ एक चौड़ा भाग अथवा समतल मार्ग है जिससे एक उपयोगी दरार पैदा करने में सुविधा हो सकती है। इन परिस्थितियों में उसमें फंस जाने वाली किसी सेना के लिए मरघट बनने के बजाए, वह खाई उन सैनिक दस्तों के पुनर्गठित होने के लिए विश्राम-स्थल बन गई थी जो ढलुए किनारे पर चढ़ते समय अस्त-व्यस्त हो जाती थी।
घेरे के नियमों के अनुसार एक ऐसे स्थान पर, जिसके चारों तरफ खंदकें हैं, धावा करना उस वक्त भी पागलपन होता जिस वक्त कि उसकी पहली शर्त, यानी जगह को चारों तरफ से घेरने के लिए पास में आवश्यक फौजें होने की शर्त भी, पूरी हो गई होती। रक्षात्मक तैयारियों की जो स्थिति थी, रक्षकों की जो असंगठित और पस्तहिम्मती से भरी अवस्था थी, उसको देखते हुए हमले का जो तरीका अपनाया गया, उसके अलावा किसी भी दूसरे तरीके का अपनाया जाना एक अक्षम्य अपराध होता। शक्तिपूर्ण हमले के नाम से यह तरीका फौजी लोगों को अच्छी तरह ज्ञात है। रक्षात्मक मोर्चेबंदी जब ऐसी हो कि भारी तोपों के बिना उस पर हमला करना असंभव हो जाए, तब तोपखाने की मदद से उससे तुरत-फुरत निपट लिया जाता है; किले के अंदरूनी भाग पर गोलाबारी निरंतर जारी रखी जाती है, और ज्योंही दरारें इस लायक हो जाती हैं कि उनका इस्तेमाल किया जा सके, त्योंही हमले के लिए फौजें आगे बढ़ जाती हैं।
जिस मोर्चे पर हमला किया जा रहा था, वह उत्तर की तरफ था, यानी अंगरेजों के शिविर के एकदम सामने था। इस मोर्चे पर दो कोटे और तीन बुर्ज हैं। मध्य के (कश्मीरी गेट के) बुर्ज से वे थोड़े तिरछे कोण पर पड़ते हैं। उसका पूर्वी भाग, कश्मीरी गेट के बुर्ज से पानी के बुर्ज तक का भाग, अपेक्षाकृत छोटा है, और, कश्मीरी गेट और मोरी गेट के बुर्जों के बीच, पश्चिमी भाग के सामने, थोड़ा सा आगे बढ़ा हुआ है। कश्मीरी गेट के बुर्ज और पानी के बुर्ज के सामने का मैदान हलके जंगल, बाग-बगीचों, मकानों, आदि से घिरा हुआ है। सिपाहियों ने इसे साफ नहीं किया था। इस कारण हमलावरों को उससे मदद मिलती थी। (इसी चीज से इस बात का जवाब मिल जाता है कि वहां की तोपों के बिलकुल सामने भी अंगरेज अकसर देशी सिपाहियों का पीछा करते हुए कैसे उतनी दूर चले जाते थे। उस समय इस कार्य को बहुत बहादुरी का समझा जाता था, लेकिन, वास्तव में, जब तक उनको यह आड़ प्राप्त थी, तब तक इस तरह पीछा करने में मुश्किल से ही कोई खतरा था।) इसके अलावा, इस मोर्चे से लगभग 400 या 500 गज की दूरी पर, फसील के ही
आमने-सामने एक गहरा नाला था। सामने से हमला करने में इससे स्वाभाविक रूप से सहायता मिलती थी। नदी से अंगरेजों के बाएं बाजू को जबरदस्त सहारा तो मिलता ही था, लेकिन, इसके अतिरिक्त, कश्मीरी गेट और पानी के बुर्जों के बीच के हलके से उस उभार का आक्रमण के मुख्य लक्ष्य के रूप में चुनाव किया जाना भी बहुत सही था। साथ ही साथ, पश्चिम की फसील और बुर्जों के ऊपर एक बनावटी हमला भी किया गया। यह चाल इतनी कामयाब रही कि सिपाहियों की मुख्य शक्ति उसी दिशा में लग गई। काबुली गेट के बाहर के उपनगरों में, अंगरेजों के दाहिने पार्श्व पर हमला करने के लिए उन्होंने मजबूत सेना इकट्ठी कर ली। मोरी गेट और कश्मीरी गेट के बुर्जों के बीच की पश्चिम वाली फसील को अगर सबसे ज्यादा खतरा होता तब तो यह दाव एकदम सही और अत्यधिक कारगर हुआ होता। सक्रिय सुरक्षा के एक साधन के रूप में बाजू से घेरने वाली सिपाहियों की यह चाल बहुत बढ़िया रही होती; वैसी हालत में, आगे बढ़कर, हमला करने वाली प्रत्येक सैनिक टुकड़ी को पहले से ही यह सेना बाजू से दबा लेती। लेकिन, इस मोर्चे की पहुंच पूर्व की ओर कश्मीरी गेट और पानी के बुर्जों के दरम्यान की फसील तक नहीं हो सकी; और, इस तरह, उस पर कब्जा होने से रक्षा करने वाली फौजों का सबसे अच्छा भाग रणक्षेत्र के निर्णायक स्थान से दूर हट गया।
तोपों को लगाने के अड्डों के चुनाव, उनके निर्माण और हथियारों से उनको लैस करने का काम जिस तरह से किया गया था, और जिस तरह से उनका इस्तेमाल किया गया था, उसकी अधिक से अधिक प्रशंसा की जानी चाहिए। अंगरेजों के पास लगभग 50 तोपें और मॉर्टर थे जो अच्छी ठोस रक्षात्मक दीवालों के पीछे शक्तिशाली बैटरियों के साथ केंद्रित थे। सरकारी बयानों के अनुसार, जिस मोर्चे पर हमला किया जा रहा था, उस पर सिपाहियों के पास 55 तोपें थीं, लेकिन वे छोटे-छोटे बुर्जों और माटर्ेलों लाठों पर इधर-उधर बिखरी हुई थीं। वे मिलकर केंद्रित रूप से काम नहीं कर सकती थीं, और तीन फुट का जो रद्दी सा कमरकोटा था, उससे उनका मुश्किल से ही कोई बचाव होता था। इसमें कोई शक नहीं कि रक्षा करने वालों की तोपों को खामोश करने के लिए कुछ ही घंटे काफी हुए होंगे और उसके बाद करने के लिए फिर बहुत ही कम रह गया था।
8 तारीख को, फसील से 700 गज की दूरी से, बैटरी (तोपखाना) नं. 1 की 10 तोपों ने गोलाबारी शुरू की। जब रात आई, तो जिस नाले का पहले जिक्र किया गया है, उसे एक प्रकार की खंदक में बदल दिया गया। 9 तारीख को, बिना किसी प्रतिरोध के, इस नाले के सामने के टूटे-फूटे मैदान और मकानों पर कब्जा कर लिया गया; और 10 तारीख को बैटरी नं.2 की 8 तोपों के मुंह खोल दिए गए। यह बैटरी फसील से 500 या 600 गज के फासले पर थी। 11 तारीख को बैटरी नं. 3 नेजिसे किसी टूटी हुई जगह में, पानी के बुर्ज से 200 गज की दूरी पर, बहुत हिम्मत और होशियारी के साथ खड़ा किया गया थाअपनी 6 तोपों से गोले बरसाने शुरू किए और 10 भारी मॉर्टरों ने शहर पर गोलाबारी आरंभ कर दी।
13 तारीख की शाम को रिपोर्ट मिली कि दरारें पैदा हो गई हैंएक कश्मीरी बुर्ज के दाहिने बाजू की फसील में और दूसरी, पानी के बुर्ज के बाएं बाजू में, सामने की तरफ। सीढ़ियां लगा कर इन दरारों से ऊपर चढ़ा जा सकता है। फौरन हमले का हुक्म दे दिया गया। 11 तारीख को संकटग्रस्त दोनों बुर्जों के बीच के ढाल पर सिपाहियों ने जवाबी हमला करने की कोशिश की और, अंगरेजों की बैटरियों के सामने ही, लगभग 350 गज पर, लड़ाई के लिए एक खंदक तैयार कर ली गई। इसी अड्डे से, काबुली गेट के बाहर, बाजुओं से आक्रमण के लिए भी वे आगे बढ़े। लेकिन सक्रिय रक्षा के ये प्रयत्न बिना किसी एकता, योजना या उत्साह के किए गए थे। उनका कोई फल नहीं निकला।
14 तारीख की सुबह अंगरेजों की 5 सैनिक टुकड़ियां हमले के लिए आगे बढ़ीं। एक, दाहिनी तरफ, काबुली गेट के अड्डे पर कब्जा करने के लिए और,इसमें सफलता मिलने पर, लाहौरी गेट पर हमला करने के लिए। शेष एक-एक टुकड़ी हर दरार की तरफ गई, एक कश्मीरी गेट की तरफ बढ़ी जिसको उसे उड़ा देना था, और एक बतौर रिजर्व काम करने के लिए गई। पहली को छोड़ कर, ये सारी सैनिक टुकडियां सफल हुईं। दरारों की तो नाममात्र के लिए ही रक्षा की जा रहा थी, लेकिन फसील के पास के मकानों से किया जाने वाला प्रतिरोध बहुत जबरदस्त था। इंजीनियरों की टुकड़ी के एक अफसर और तीन साजर्ेंटों की बहादुरी के कारण (क्योंकि यहां वास्तव में बहादुरी दिखाई गई थी) कश्मीरी गेट को सफलतापूर्वक खोल दिया गया और, इस तरह यह सैनिक टुकड़ी भी अंदर घुसने में समर्थ हुई। शाम तक पूरा उत्तरी मोर्चा अंगरेजों के कब्जे में आ गया था। लेकिन जनरल विल्सन यहीं पर रुक गए। जो धुआंधार हमला किया जा रहा था, उसे बंद कर दिया गया, तोपों को आगे लाया गया और शहर के हर मजबूत मुकाम के खिलाफ उन्हें लगा दिया गया। शस्त्रागार पर हमला करके कब्जा करने की बात छोड़ दी जाए तो वास्तव में बहुत ही कम लड़ाई हुई मालूम होती है। विद्रोहियों की हिम्मत पस्त हो गई थी और वे भारी संख्या में शहर छोड़ कर चले गए। विल्सन शहर में सावधानी से घुसे, 17 तारीख के बाद उन्हें मुश्किल से ही किसी से लड़ना पड़ा। 20 तारीख को उस पर उन्होंने पूरा कब्जा कर लिया।
आक्रमण के संचालन के संबंध में हमारी राय जाहिर की जा चुकी है। जहां तक बचाव का सवाल है, तो जवाबी हमले करने की कोशिशों, काबुली गेट के पास बाजू से घेरने के प्रयत्न, जवाबी घातें, राइफल चलाने की खंदकें,ये सब चीजें बतलाती हैं कि युध्द संचालन की कुछ वैज्ञानिक धारणाएं सिपाहियों के अंदर भी प्रवेश कर गई थीं; लेकिन उन पर किसी प्रभावशाली ढंग से अमल न किया जा सका, क्योंकि या तो सिपाहियों को वे पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं थीं, अथवा उन पर अमल करने लायक काफी शक्ति वे नहीं रखते थे। इन वैज्ञानिक धारणाओं की कल्पना स्वयं भारतीयों ने की थी, अथवा उन कुछ यूरोपियनों ने जो उनके साथ हैंइस बात का निर्णय करना निस्संदेह कठिन है। लेकिन एक चीज निश्चित है : ये कोशिशें, यद्यपि उन पर अमल ठिकाने से नहीं किया गया था, अपनी योजना
और तैयारी में सेवास्तोपोल की सक्रिया सुरक्षा की योजना और तैयारी से बहुत मिलती-जुलती हैं, और जिस तरह से उनको कार्यान्वित किया गया था, उससे मालूम होता है मानो किसी यूरोपियन अफसर ने सिपाहियों के लिए एक सही योजना तैयार कर दी थी, लेकिन सिपाही या तो उसे अच्छी तरह समझ नहीं पाए, या फिर संगठन और नेतृत्व के अभाव के कारण ये अमली योजनाएं उनके हाथों में महज कमजोर और बेजान कोशिशें बन कर रह गईं।
(5 दिसंबर 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5188, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)

1857 में लखनऊ पर हमले का पूरा वृत्तान्त- फ्रेडरिक एंगेल्स


                        आखिरकार लखनऊ पर किए गए हमले और उसके पतन का ब्योरेवार वृत्तांत अब हमें प्राप्त हो गया है। सैनिक दृष्टि से सूचना का मुख्य स्रोत जो चीज हो सकती थी, यानी सर कॉलिन कैंपबेल की रिपोर्ट, वह तो वास्तव में अभी तक प्रकाशित नहीं की गई है; लेकिन ब्रिटेन के अखबारों में छपे हुए संवाद, और खास तौर से, लंदन टाइम्स में प्रकाशित हुए मिस्टर रसेल के पत्र जिनके मुख्य अंश हमारे पाठकों के सामने रखे जा चुके हैं। हमलावर दल की कार्रवाइयों की आम स्थिति को बताने के लिए बिलकुल काफी हैं।
तार से प्राप्त हुए समाचारों के आधार पर रक्षात्मक कार्रवाइयों में दिखलाई गई कायरता के संबंध में जो निष्कर्ष हमने निकाले थे, उन्हें विस्तृत रिपोर्टों ने एकदम सही साबित कर दिया है। हिंदुओं ने जो किलेबंदी की थी, वह देखने में भयानक लगने पर भी, वास्तव में उन आग्नेय पंखदार ब्यालों और विकृत चेहरों की आकृतियों से अधिक महत्व की नहीं थी जो चीनी 'योध्दा' अपनी ढालों पर अथवा अपने शहरों की दीवालों पर बना देते हैं। ऊपर से देखने पर प्रत्येक किला एक अभेद्य दीवार मालूम होता था। गोलीबारी के लिए बनाए गए गुप्त छेदों और मार्गों और कमरकोटों के अलावा और कुछ उसमें नहीं दिखलाई देता था। उसके पास पहुंचने के मार्ग में हर संभव प्रकार की कठिनाई दृष्टिगत होती थी। हर जगह उनमें तोपें और छोटे हथियार अड़े हुए दिखलाई देते थे। लेकिन हर ऐसे किलेबंद मोर्चे के बाजुओं और पिछवाड़े को पूर्णतया उपेक्षित छोड़ दिया गया था; विभिन्न किलेबंदियों के बीच पारस्परिक सहयोग की बात तो जैसे कभी सोची ही नहीं गई थी; और, किलेबंदियों के बीच की और उनके आगे की जमीन तक को कभी साफ नहीं किया गया था। इससे रक्षा करने वालों की जानकारी के बिना ही, सामने से और बाजुओं से, दोनों तरफ से, उन पर हमले की तैयारियां की जा सकती थीं और नितांत निरापद रूप से कमरकोटे के कुछ गज पास तक पहुंचा जा सकता था। सुरंग लगाने वाले ऐसे निजी सिपाहियों के एक समूह से, जिसके कोई अफसर नहीं रह गए थे और जो ऐसी सेना में काम कर रहे थे जिसमें अज्ञान और अनुशासनहीनता का ही बोलबाला था, जिस प्रकार की किलेबंदियों की अपेक्षा की जा सकती थी, ये उसी प्रकार की किलेबंदियां थीं। लखनऊ की किलेबंदियां क्या थीं, बस देशी सिपाहियों के लड़ने का जो पूरा तरीका है उसी को जैसे पक्की ईंटों की दीवालों और मिट्टी के कमरकोटों का रूप दे दिया गया था। यूरोपियन सेनाओं की कार्य-नीति का जो यांत्रिक या ऊपरी भाग था, उसे तो आंशिक रूप से उन्होंने जान लिया था; कवायद के नियमों और प्लैटून की ड्रिल के तरीकों की उन्हें काफी जानकारी हो गई थी; तोपें लगाकर बैट्री का निर्माण वे कर ले सकते थे और दीवाल में गुप्त रास्ते भी बना सकते थे; लेकिन किसी मोर्चे की रक्षा के लिए कंपनियों और बटैलियनों की गतिविधियों को किस तरह से संयोजित किया जाए, अथवा बैट्रियों और गुप्त मार्गों वाले मकानों और दीवालों को किस तरह एक सूत्र में ऐसे पिरोया जाए कि उनसे मुकाबला कर सकने लायक कैंप कायम हो जाएइसके बारे में वे कुछ भी नहीं जानते थे। इस प्रकार, आवश्यकता से अधिक छेद बनाकर अपने महलों की ठोस पक्की दीवालों को उन्होंने कमजोर कर दिया था; उनमें गुप्त मार्गों और रंध्रों (छेदों) की तहों पर तहें उन्होंने बना दी थीं; उनकी छतों पर चबूतरे बनाकर उन्होंने बैट्रियां लगा दी थीं; लेकिन यह सब बेकार था, क्योंकि उन्हें बहुत आसानी से उनके खिलाफ ही इस्तेमाल किया जा सकता था। इसी तरह से, यह जानते हुए कि सैनिक कार्यनीति में वे कच्चे हैं, अपनी इस कमी को पूरा करने की कोशिश में हर चौकी पर उन्होंने अधिक से अधिक आदमी ठूंस दिए थे। इसका नतीजा सिवा इसके और कुछ हो नहीं सकता था कि उससे अंगरेजों की तोपों को भयानक सफलता प्राप्त हो जाए; और, ठलुओं की इस भीड़ पर किसी अप्रत्याशित दिशा से आक्रमणकारी सेनाएं ज्योंही धावा बोल दें, त्योंही किसी भी तरह का अनुशासित और व्यवस्थित रक्षात्मक कार्य वहां असंभव हो जाए। और जब किसी आकस्मिक योग से किलेबंदियों के भयानक दिखने वाले इस मोर्चे पर हमला करने के लिए अंगरेज मजबूर हो गए, तो यह देखा गया कि इन किलेबंदियों का निर्माण इतना दोषपूर्ण था कि बिना किसी जोखिम के ही उनके पास पहुंचा जा सकता था, उन्हें तोड़ा जा सकता था और उन पर अधिकार किया जा सकता था। इमामबाड़े में ऐसा ही देखने को मिला था। इस इमारत से कुछ ही गजों के फासले पर एक पक्की दीवाल थी। अंगरेजों ने इस दीवाल के बिलकुल पास तक एक छोटी सी सुरंग बना ली (यह इस बात का सबूत है कि इमारत के ऊपरी हिस्से में तोपों के लिए जो झरोखे और रंध्र बनाए गए थे, उनसे एकदम सामने के मैदान पर गोलंदाजी नहीं की जा सकती थी)। उसके बाद इसी दीवाल का, जिसे स्वयं हिंदुस्तानियों ने अपने लिए बनाया था, अंगरेजों ने इमारत को तोडने के लिए एक आड़ के रूप में इस्तेमाल किया। इस दीवाल के पीछे वे 68-68 पौंड की दो तोपें (नौ सैनिक तोपें) ले आए। ब्रिटिश सेना में 68 पौंड वाली हल्की से हल्की तोप का वजन भी, उसकी गाड़ी के बिना, 87 हंड्रेडवेट होता है; लेकिन अगर मान लें कि बात 8 इंच वाली तोप की ही की जा रही है, तो इस तरह की हल्की से हल्की तोप का वजन भी 50 हंड्रेडवेट होता है, और गाड़ी समेत कम से कम 3 टन। इस तरह की तोपें एक ऐसे महल के नजदीक तक ले आई जा सकीं जो कई मंजिल ऊंचा है और जिसकी छत पर तोपखाना लगा हुआ है, यह बात जाहिर करती है कि रक्षा करने वाले सिपाही सैनिक इंजीनियरिंग के संबंध में जिस प्रकार अनभिज्ञ थे और सैनिक महत्व की जगहों के संबंध में जिस प्रकार का तिरस्कार भाव उनमें भरा हुआ था, उस तरह की चीज किसी भी सभ्य सेना के किसी भी सुरंग लगाने वाले सैनिकों में नहीं मिल सकती।
अब रही उस विज्ञान की बात जिसका वहां अंगरेजों को मुकाबला करना पड़ा था। जहां तक साहस और संकल्प की बात है, तो रक्षकों के अंदर इनका भी उतना ही अभाव था। ज्योंही एक सेना ने हमला किया, त्योंही मार्टीनियर से लेकर मूसाबाग तक देशियों का बस एक ही शानदार नजारा दिखलाई दियावे सब के सब सिर पर पैर रखकर भागते नजर आए! इन तमाम लड़ाइयों में एक भी ऐसी नहीं है जिसका उस कत्लेआम से भी (क्योंकि लड़ाई तो उसे मुश्किल से ही कहा जा सकता है) मुकाबला किया जा सके जो सिकंदरबाग में कैंपबेल द्वारा रेजीडेंसी की मदद के समय हुआ था। हमलावर सेनाएं ज्योंही आगे बढ़ती हैं, त्योंही पीछे की तरफ आम भगदड़ मच जाती है, और वहां से भागने के चूंकि कुछ इने-गिने ही संकरे रास्ते हैं, इसलिए यह सारी बेतहाशा भागती भीड़ वहीं ठहर जाती है। एकदम भेड़ियाधसान ढंग से लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरते-पड़ते नजर आते हैं और जरा भी प्रतिरोध किए बिना बढ़ते हुए अंगरेजों की गोलियों और संगीनों के शिकार बन जाते हैं। घबराए हुए देशियों के ऊपर किए जाने वाले इन खूली हमलों में से किसी भी एक में 'अंगरेजों की संगीन' ने जितने लोगों की जानें ली हैं, उतने लोगों की जानें यूरोप और अमरीका दोनों में अंगरेजों द्वारा लड़ी गई सारी लड़ाइयों में मिलाकर भी उसने नहीं ली थीं। पूरब की लडाइयों में जहां एक ही पक्ष सक्रिय होता है और दूसरा बिलकुल बोदे ढंग से निष्क्रिय, इस तरह के संगीन युध्द एक आम बात है; बर्मी नोकदार बल्लियों से बने मोर्चे प्रत्येक जगह इसी चीज का उदाहरण पेश करते हैं। मिस्टर रसेल के वृत्तांत के अनुसार, अंगरेजों की मुख्य क्षति जो हुई थी, वह उन्हें उन हिंदुस्तानियों से पहुंची थी जो भागते समय पीछे छूट गए थे और जिन्होंने बैरीकेड बनाकर महलों के कमरों में अपने को बंद कर लिया था। वहां से खिड़कियों के अंदर से आंगन और बाग में रहने वाले अफसरों के ऊपर उन्होंने गोलियां बरसाई थीं।
इमामबाड़े और कैसरबाग के हमले के समय हिंदुस्तानी इतनी तेजी से भागे थे कि उन जगहों पर कब्जा करने तक की जरूरत नहीं पड़ी थी। उनके अंदर अंगरेज यों ही चलते हुए पहुंच गए थे। लेकिन वास्तव में दिलचस्प चीज अब शुरू हो रही थी; क्योंकि, जैसा कि मिस्टर रसेल उल्लसित होकर कहते हैं, कैसरबाग की फतह उस दिन इतनी अप्रत्याशित थी कि इस बात तक के लिए काफी समय नहीं मिल पाया था कि अंधाधुंध लूट-खसोट को रोकने की कोई तैयारी की जा सके। अपने अंगरेज सिपाहियों को अवध के महामहिम के हीरे-जवाहरात, बहुमूल्य हथियारों, कपड़ों और उनकी तमाम पोशाकों तक को इस तरह खुल कर लूटते-खसोटते देखकर सच्चे, उद्दंडता-प्रेमी जॉन बुल को एक खास आनंद मिला होगा! सिख, गोरखे और उनके तमाम नौकर-चाकर भी अंगरेजों के इस उदाहरण की नकल करने के लिए बिलकुल तैयार थे। इसके बाद फिर लूट और तबाही का ऐसा नजारा वहां दिखलाई दिया कि उसका बयान करने की ताकत मि. रसेल की लेखनी में भी नहीं रह गई। हर कदम के साथ अब लूट-खसोट और तबाही का बाजार गर्म था। कैसरबाग का पतन 14 तारीख को हो गया था; और, उसके आधे घंटे के बाद ही अनुशासन समाप्त हो गया था। सैनिकों के ऊपर से अफसरों का सारा नियंत्रण खतम हो गया था। 17 तारीख को लूट-खसोट की रोकथाम के लिए जनरल कैंपबेल को जगह-जगह पहरा बैठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। 'जब तक मौजूदा उच्छृंखलता का दौर खतम न हो जाए,' तब तक हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने के लिए वह बाध्य हो गए। सैनिक साफ तौर से हाथ से बिलकुल बाहर निकल गए थे। 18 तारीख को हमें यह कहा जाता है कि बहुत ही निम्न किस्म की लूट-खसोट तो रुक गई है, लेकिन तबाही और बर्बादी का सिलसिला अब भी उसी तरह जारी है। लेकिन जिस समय शहर में सेना का अगला भाग, मकानों के अंदर से किए जाने वाले देशियों की गोलीबारी का मुकाबला कर रहा था, उसी समय उसका पिछला भाग खूब जी खोलकर लूट-खसोट और बर्बादी कर रहा था। शाम को लूट-खसोट के खिलाफ एक नया एलान किया गया। आदेश जारी किया गया कि प्रत्येक रेजीमेंट से छांट-छांट कर मजबूत टुकड़ियों भेजी जाएं जो लूट करने वाले अपने सैनिकों को पकड़ कर वापिस ले आएं। उन्हें यह भी आदेश दिया गया कि अपने अनुचरों को भी वे अपने साथ ही अपने घर पर रखें। जब तक कहीं डयूटी पर न भेजा जाए, तब तक कोई भी व्यक्ति कैंप से बाहर न जाए। 20 तारीख को इसी आदेश को पुन: दुहराया गया। उसी दिन, दो अंगरेज 'अफसर और भद्र प्ररुष,' लेफ्टीनेंट केप और थैकवेल, 'शहर में लूट मचाने गए और वहीं एक घर के अंदर उनकी हत्या कर दी गई। और 26 तारीख को भी हालत इतनी खराब थी कि लूट और बलात्कार को रोकने के लिए अत्यंत कठोर आदेश फिर जारी करने पड़े। हर घंटे हाजिरी लेने की व्यवस्था जारी कर दी गई। तमाम सिपाहियों को शहर के अंदर घुसने की सख्त मनाही कर दी गई। यह हुक्म जारी कर दिया गया कि अनुचर लोग अगर हथियारों के साथ शहर में पाए जाएं, तो उन्हें फांसी दे दी जाए; जिस समय सैनिक डयूटी पर न हों, वे हथियार के साथ बाहर न निकलें, और जिन लोगाें का लड़ाई से ताल्लुक नहीं है, उन सबों से हथियार छीन लिए जाएं। इन आदेशों की गंभीरता स्पष्ट कर देने के लिए 'उचित स्थानों पर' लोगों को बेंत लगाने के लिए काफी टिकटियां खड़ी कर दी गईं।
19वीं शताब्दी में किसी सभ्य सेना का इस तरह का व्यवहार सचमुच अनोखी चीज है। दुनिया की कोई भी दूसरी सेना अगर इस तरह की ज्यादतियों के दसवें हिस्से की भी गुनहगार होती, तो क्रुध्द अंगरेजी अखबार उसको किस तरह से बदनाम करते, इसकी अच्छी तरह कल्पना की जा सकती है। लेकिन ये तो ब्रिटिश सेना के कारनामे हैं, और इसलिए हमसे कहा जाता है कि युध्द में ऐसी चीजों का होना स्वाभाविक होता है। ब्रिटिश अफसरों और भद्र पुरुषों को पूर्ण स्वच्छंदता है कि चांदी के चम्मचों, हीरे-जवाहरात से जड़े कंगनों और अन्य छोटी-मोटी उन तमाम चीजों को, जिन्हें अपने गौरवस्थल पर वे पा जाएं, निशानियों के रूप में हथिया लें। और अगर युध्द के बीचोबीच भी कैंपबेल को इस बात के लिए मजबूर होना पड़ा है कि व्यापक डाकेजनी और हिंसा को रोकने की गरज से, स्वयं अपनी सेना के हथियारों को वह छीन ले, तो हो सकता है कि इस कदम को उठाने के लिए उसके पास कोई फौजी कारण रहे हों। पर, सचमुच ऐसा कौन होगा जो इतनी थकान और मुसीबतों के बाद यदि वे बेचारे हफ्ते भर की छुट्टी मनाएं और कुछ मौज-मजा करें, तो उस पर भी आपत्ति करे!
सच तो यह है कि यूरोप और अमरीका में कहीं भी ऐसी कोई सेना नहीं है जिसमें इतनी पाशविकता भरी हो जितनी कि ब्रिटिश सेना में है। लूट-खसोट, हिंसा, कत्लेआम आदि की वे चीजें, जिन्हें हर जगह सख्ती से और पूर्णतया खतम कर दिया गया है, ब्रिटिश सिपाही का अब भी एक पुरातन अधिकार, उसका एक निहित विशेषाधिकार मानी जाती हैं। स्पेन के युध्द में बाडाजोज और सान सेबास्टिन पर हमला करके अधिकार कर लेने के बाद, ब्रिटिश सैनिकों ने लगातार कई दिनों तक जो कुत्सित कार्य वहां किए थे, उनका फ्रांसीसी क्रांति के आरंभ के बाद से किसी भी दूसरे देश के इतिहास में दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। कब्जा किए गए शहर को लूटने-खसोटने के लिए सिपाहियों को सौंप देने की मध्ययुगीन प्रथा पर और सभी जगहों में प्रतिबंध लगा दिए गए हैं, लेकिन ब्रिटिश सेना में यह नियम अब भी उसी प्रकार चालू है। जरूरी सैनिक आवश्यकताओं की वजह से दिल्ली में इस चीज को रोका गया था; और यद्यपि उसके एवज में ज्यादा तनखाह देकर सेना को खुश करने की कोशिश की गई थी, फिर भी वह काफी बुड़बुड़ाई थी। और अब लखनऊ में दिल्ली की सारी कमी को उसने पूरा कर लिया है। बारह दिन और बारह रात तक लखनऊ में कोई ब्रिटिश सेना नहीं थीबस कानूनहीन, शराब में धुत पाशविकता से भरी हुई केवल एक भीड़ थी। वह डाकुओं के गिरोहों में बंटी हुई थी। और ये डाकू देशी सिपाहियों से कहीं अधिक बेलगाम, हिंस्र और लालची थे जिन्हें वहां से निकाल बाहर किया गया था। 1858 में की गई लखनऊ की लूट-खसोट और बर्बादी ब्रिटिश सेना के माथे पर हमेशा एक अमिट कलंक के रूप में अंकित रहेगी।
भारत को सभ्य और इनसान बनाने की क्रिया में क्रूर ब्रिटिश सैनिकों ने अगर भारतीयों की केवल निजी संपत्ति की ही लूट-मार मचाई थी, तो उसके फौरन बाद ब्रिटिश सरकार स्वयं आगे आ गई और उसने भारतीयों की वास्तविक रियासतों को भी हड़प लिया। लोग बातें करते हैं कि प्रथम फ्रांसीसी क्रांति ने अमीर-उमरा और गिरजाघरों की जमीनें छीन ली थीं। लोग कहते हैं कि लुई नेपोलियन ने ओरलिंयस परिवार की संपत्ति जब्त कर ली थी। पर यहां लार्ड कैनिंग हैंएक ब्रिटिश अमीर, जो अपनी भाषा,आचार-व्यवहार और भावनाओं में मधुर हैं। वे पधारते हैं और अपने एक उच्च अधिकारी, विस्काउंट पामर्सटन की आज्ञा से, एक पूरी कौम की रियासतों को हजम कर जाते हैं। 10,000 वर्ग मील के क्षेत्र में एक-एक धूर, एक-एक कट्ठा और एक-एक एकड़ भूमि पर वे कब्जा कर लेते हैं! जॉन बुल के लिए यह सचमुच बहुत बढ़िया लूट है! और नई सरकार के नाम पर, लार्ड एलेनबरो ज्योंही इस बेमिसाल हरकत को अनुचित ठहराते हैं,त्योंही इस जबरदस्त डाकेजनी की हिमायत करने के लिए और यह दिखाने के लिए कि जॉन बुल को इस बात का पूरा अधिकार है कि वह जिस चीज को चाहें उसे जब्त कर लेंटाइम्स और दूसरे अनेक छोटे-मोटे ब्रिटिश अखबार फौरन उठ खड़े होते हैं! पर हां, जॉन तो एक असाधारण प्राणी है! उसके लिए जो हरकत सद्गुण है, उसी को अगर दूसरा कोई करने की हिमाकत दिखाए, तो टाइम्स की नजर में वह महाघातक बन जाएगा!
इसी बीच, लूट-खसोट के लिए ब्रिटिश सेना के एकदम तितर-बितर हो जाने के कारण, विद्रोही भाग कर खुले मैदानों में दूर निकल गए। उनका पीछा करने वाला कोई नहीं था। वे रुहेलखंड में फिर जमा हो रहे हैं। साथ ही साथ उनका एक छोटा सा भाग अवध की सीमा में छोटी-मोटी लड़ाइयां लड़ रहा है। कूछ दूसरे भगोड़े बुंदेलखंड की तरफ निकल गए हैं। साथ ही गर्मी का मौसम और वर्षा के दिन भी तेजी से समीप आते जा रहे हैं और इस बात की आशा करने का कोई कारण नहीं है कि इस बार भी मौसम यूरोपियनों के लिए, पिछले वर्ष की ही तरह, अप्रत्याशित रूप से उतना ही अनुकूल होगा। पिछले साल, अधिकांश यूरोपियन सैनिक वहां के मौसम के आदी हो गए थे; इस साल उनमें से अधिकांश नए-नए वहां पहुंचे हैं। इसमें संदेह नहीं कि जून, जुलाई और अगस्त में किए जाने वाले सैनिक अभियानों में अंगरेजों को भारी संख्या में लोगों की जाने गंवानी पड़ेंगी, और हर जीते गए शहर में गैरीसनों को तैनात करने की आवश्यकता के कारण, उनकी सक्रिय सेना बहुत जल्दी साफ हो जाएगी। अभी से ही हमें बता दिया गया है कि 1,000 सैनिकों की मासिक सहायता से भी सेना इस स्थिति में नहीं रहेगी कि वह कारगर रह सके। और जहां तक गैरीसनों की बात है, तो केवल लखनऊ के लिए 8,000 सैनिकों की, यानी कैंपबेल की एकतिहाई सेना से भी अधिक की आवश्यकता है। रुहेलखंड के अभियान के लिए जो शक्ति संगठित की जा रही है वह भी लखनऊ के इस गैरीसन की तुलना में मुश्किल से ही बड़ी होगी। विद्रोहियों की बड़ी-बड़ी सेनाओं के इधर-उधर तितर-बितर हो जाने के बाद यह निश्चित है कि छापेमार युध्द शुरू हो जाएगा। हमें यह इत्तिला भी मिल गई है कि ब्रिटिश अफसरों के अंदर यह राय बन रही है कि वर्तमान युध्द और उसके साथ जमकर होने
वाली लड़ाइयों और घेरों की तुलना में, छापेमार युध्द अंगरेजों के लिए कहीं अधिक कष्टदायक और जानलेवा साबित होगा। और, अंत में, सिख भी इस तरह से बात करने लगे हैं जो अंगरेजों के लिए बहुत शुभ नहीं मालूम होती है। वे महसूस करते हैं कि उनकी सहायता के बिना अंगरेज भारत के ऊपर कब्जा नहीं बनाए रख सकते थे, और अगर विद्रोह में वे भी शामिल हो गए होते तो यह निश्चित है कि, कम से कम कुछ समय के लिए, हिंदुस्तान से इंगलैंड हाथ धो बैठता। इस बात को वे जोर-जोर से कह रहे हैं और अपने पूर्वी ढंग से बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे हैं। अंगरेज अब उनकी नजर में उतनी अधिक श्रेष्ठ कौम नहीं रह गई जिसने मुड़की, फीरोजशाह और अलिवाल में उन्हें परास्त कर दिया था। इस तरह के विश्वास के बाद, खुली शत्रुता करने लगना पूर्वी देशों के लिए एक ही कदम दूर रह जाता है। एक चिनगारी से भी आग भड़क सकती है।
संक्षेप में, लखनऊ की फतह भी भारतीय विद्रोह को कुचलने में उसी तरह असफल रही है जिस तरह कि दिल्ली की फतह उसे खतम करने में नाकामयाब रही थी। इस साल गर्मियों के सैनिक अभियान के फलस्वरूप ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जा सकती है जिसके कारण अगले जाड़ों में अंगरेजों को मोटे तौर से फिर वहीं से काम शुरू करना पड़ जाए जहां से उन्होंने पहले शुरू किया था। यह भी संभव है कि पंजाब को भी उन्हें फिर से फतह करना पड़े। लेकिन अनुकूल से अनुकूल परिस्थिति में भी, उन्हें एक लंबे और कष्टदायक छापामार युध्द का सामना करना पड़ेगा। भारत की गर्मी में यूरोपियनों के लिए यह कोई ऐसी अच्छी चीज नहीं है जिससे कोई दूसरा ईर्ष्या कर सके!

(25 मई 1858 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5333, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)
 

साभार : नया जमाना