मई 05, 2011

1857 में भारत से आने वाले समाचार- कार्ल मार्क्स



     भारत से आने वाली पिछली डाक, जिसमें दिल्ली की 17 जून तक की और बंबई की 1 जुलाई तक की खबरें मौजूद हैं, भविष्य के संबंध में अत्यंत निराशापूर्ण चिंताएं उत्पन्न करती हैं। नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष, मि. वर्नन स्मिथ ने जब भारतीय विद्रोह की पहले-पहल कॉमन्स सभा को सूचना दी थी, तो उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा था कि अगली डाक यह खबर लेती आएगी कि दिल्ली को जमींदोज कर दिया गया है। डाक आई, लेकिन दिल्ली को अभी तक 'इतिहास के पृष्ठों से साफ' नहीं किया जा सका है। उस वक्त कहा गया था कि तोपखाने की गाड़ी 9 जून से पहले नहीं लाई जा सकेगी और इसलिए शहर पर, जिसकी किस्मत का फैसला हो चुका है, उस तारीख तक के लिए हमला रुक जाएगा। पर 9 जून भी बिना किसी उल्लेखनीय घटना के ही गुजर गया। 12 और 15 जून को कुछ घटनाएं हुईं, लेकिन उलटी ही दिशा मेंदिल्ली पर अंगरेजों का धावा नहीं हुआ, बल्कि अंगरेजों के ऊपर विप्लवकारियों ने हमला बोल दिया। लेकिन उनके बारंबार होने वाले इन हमलों को रोक दिया गया है। इस तरह दिल्ली का पतन फिर स्थगित हो गया है। इसका तथाकथित एकमात्र कारण अब घेरे के लिए तोपखाने की कमी नहीं है, बल्कि उसका कारण जनरल बरनार्ड का यह फैसला है कि और फौजों के आने का इंतजार किया जाए; क्योंकि उस प्राचीन राजधानी पर कब्जा करने के लिए, जिसकी 30 हजार देशी सिपाही हिफाजत कर रहे हैं और जिसके अंदर फौजी सामानों के तमाम गोदाम मौजूद हैं, 3 हजार सैनिकों की फौजी शक्ति एकदम नाकाफी थी। विद्रोहियों ने अजमेरी गेट के बाहर भी एक छावनी कायम कर ली थी। अभी तक फौजी विषयों के तमाम लेखक इस बारे में एकमत थे कि 3 हजार सैनिकों की अंगरेजी फौज 30 या 40 हजार सैनिकों की देशी सेनाको कुचलने के लिए बिलकुल काफी थी। और अगर बात ऐसी नहीं होती, तो लंदन टाइम्स के शब्दों में, इंगलैंड भारत को 'फिर से फतह करने' में समर्थ कैसे हो सकेगा?
भारत की सेना में वास्तव में 30 हजार ब्रिटिश सैनिक हैं। अगले छह महीनों में अंगरेज इंगलैंड से जो सैनिक वहां भेज सकते हैं, उनकी संख्या 20 या 25 हजार सैनिकों से अधिक नहीं हो सकती। इसमें से 6 हजार सैनिक ऐसे होंगे जो भारत में यूरोपियनों की खाली हुई जगहों पर काम करेंगे। बाकी बचे 18 या 19 हजार सैनिकों की शक्ति भी कठिन यात्रा की हानियों, प्रतिकूल जलवायु के नुकसानों और अन्य दुर्घटनाओं के कारण कम होकर लगभग 14 हजार सैनिकों की हो जाएगी। वे ही युध्द के मैदान में उतर सकेंगे। ब्रिटिश सेना को फैसला करना होगा कि या तो वह अपेक्षाकृत इतनी कम संख्या के साथ बागियों का सामना करे, या फिर उनका सामना करने का खयाल एकदम छोड़ दे। हम अभी तक इस चीज को नहीं समझ पा रहे हैं कि दिल्ली के इर्द-गिर्द फौजों को जमा करने के काम में वे इतनी ढिलाई क्यों दिखा रहे हैं। अगर इस मौसम में भी गर्मी एक अविजेय बाधा प्रतीत होती है, जो सर चार्ल्स नेपियर के दिनों में सिध्द नहीं हुई थी, तो कुछ महीनों बाद, यूरोपियन फौजों के आने पर, कुछ न करने के लिए बारिश और भी अच्छा बहाना उपस्थित कर देगी। इस चीज को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि वर्तमान बंगावत दरअसल जनवरी के महीने में ही शुरू हो गई थी; और, इस तरह, अपने गोला-बारूद और अपनी फौजों को तैयार रखने के लिए ब्रिटिश सरकार को काफी पहले से चेतावनी मिल चुकी थी।
अंगरेजी फौजों की घेरेबंदी के बाद भी दिल्ली पर देशी सिपाहियों का इतने दिनों तक कब्जा बने रहने का निस्संदेह स्वाभाविक असर हुआ है। बंगावत कलकत्ते के एकदम दरवाजे तक पहुंच गई है, बंगाल की 50 रेजीमेंटों का अस्तित्व मिट गया है, स्वयं बंगाल की सेना अतीत की एक कहानी मात्र रह गई है, और एक विशाल क्षेत्र में विप्लवकारियों ने इधर-उधर बिखरे और अलग-थलग जगहों में फंस गए यूरोपियनों की या तो हत्या कर दी है या वे एकदम हताश होकर अपनी हिफाजत करने की कोशिश कर रहे हैं। इस बात का पता लग जाने के बाद कि सरकार के आसन पर अचानक हमला करने का एक षडयंत्र रच लिया गया था जो, कहा जाता है कि, पूर ब्योरे के साथ मुकम्मिल था, स्वयं कलकत्ते के ईसाई बाशिंदों ने एक स्वयंसेक रक्षा-दल तैयार कर लिया है और वहां की देशी फौजों को तोड़ दिया गया है। बनारस में एक देशी रेजीमेंट से हथियार छीनने की कोशिश का सिखों के एक दल और 13वीं अनियमित घुड़सवार सेना ने विरोध किया है। यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह मालूम होता है कि मुसलमानों की ही तरह सिख भी ब्राह्मणों के साथ मिलकर आम मोर्चा बना रहे हैं; और, इस तरह, ब्रिटिश शासन के विरुध्द समस्त भिन्न-भिन्न जातियों की व्यापक एकता तेजी से कायम हो रही है। अंगरेजों का यह दृढ़ विश्वास रहा है कि देशी सिपाहियों की सेना ही भारत में उनकी सारी शक्ति का आधार है।
अब, यकायक, उन्हें पक्का यकीन हो गया है कि ठीक वही सेना उनके लिए खतरे का एकमात्र कारण बन गई है। भारत के संबंध में हुई पिछली बहसों के दौरान भी, नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष मि. वर्नन स्मिथ ने एलान किया था कि 'इस तथ्य पर कभी भी जरूरत से ज्यादा जोर नहीं दिया जा सकता कि देशी रजवाड़ों और विद्रोह के बीच किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है।' दो दिन बाद, वर्नन स्मिथ को एक समाचार प्रकाशित करना पड़ा जिसमें अशुभ सूचक यह परिच्छेद है :
14 जून को अवध के भूतपूर्व बादशाह को, जिनके बारे में पकड़े गए कागजों से पता चला था कि वह षडयंत्र में शामिल थे, फोर्ट विलियम के अंदर कैद कर दिया गया था और उनके अनुयायियों से हथियार छीन लिए गए थे।
धीरे-धीरे और भी ऐसे तथ्य सामने आएंगे जो स्वयं जौन बुल तक को इस बात का विश्वास दिला देंगे कि जिसे वह एक फौजी बंगावत समझता है, वह वास्तव में, एक राष्ट्रीय विद्रोह है।
अंगरेजी अखबार इस विश्वास से बहुत सांत्वना पाते प्रतीत होते हैं कि विद्रोह अभी तक बंगाल प्रेसिडेंसी की सीमाओं से आगे नहीं फैला है और बंबई और मद्रास की फौजों की वफादारी के संबंध में रत्ती भर भी संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। लेकिन सुखद विचार के इस पहलू को निजाम की घुड़सवार सेना में औरंगाबाद में शुरू हुई बंगावत के संबंध में पिछली डाक से आई खबर बुरी तरह काटती प्रतीत होती है। औरंगाबाद बंबई प्रेसिडेंसी के इसी नाम के एक जिले की राजधानी है। स्पष्ट है कि पिछली डाक ने बंबई की सेना में भी विद्रोह के श्रीगणेश का एलान कर दिया है। वास्तव में, कहा तो यह जाता है कि औरंगाबाद की बंगावत को जनरल वुडबर्न ने फौरन कुचल दिया है, लेकिन, क्या मेरठ की बंगावत को भी फौरन कुचल दिए जाने की बात नहीं कही गई थी? सर एच. लॉरेंस द्वारा कुचल दिए जाने के बाद, लखनऊ की बंगावत भी क्या पखवाड़े भर बाद पुन: और भी अदम्य रूप में नहीं फूट पड़ी थी? क्या यह याद नहीं है कि भारतीय फौज की बंगावत के संबंध में दी गई पहली सूचना के साथ ही साथ इस बात की भी सूचना नहीं दी गई थी कि शांति स्थापित कर दी गई है? बंबई या मद्रास की सेनाओं का अधिकांश यद्यपि नीची जाति के लोगों का बना है, लेकिन प्रत्येक रेजीमेंट में अब भी कुछ सौ राजपूत मिल जाएंगे। बंगाल की सेना के उच्च वर्ण के विद्रोहियों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए यह संख्या पर्याप्त है। पंजाब को शांत घोषित किया गया है, लेकिन इसी के साथ हमें सूचित किया गया है कि 'फिरोजपुर में, 13 जून को, फौजी फांसियां हुई थीं'! और, इसी के साथ बाघन की सेनापंजाब की 5वीं पैदल सेना की '55वीं देशी पैदल सेना का पीछा करने में सराहनीय कार्य करने' के लिए प्रशांसा की गई है। कहना पड़ेगा कि यह बहुत ही विचित्र प्रकार की 'शांति' है!
(14 अगस्त 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5091, में प्रकाशित हुआ।)
 साभार : नया जमाना

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में लखनऊ पर कब्जे की कहानी फ्रेडरिक एंगेल्स की जुबानी





                भारतीय विद्रोह के दूसरे संकटपूर्ण काल की समाप्ति हो गई है। पहले का केंद्र दिल्ली था; उसका अंत उस शहर पर हमले के द्वारा कब्जा करके किया गया था। दूसरे का केंद्र लखनऊ था और अब उसका भी पतन हो गया है। जो जगहें अभी तक शांत रही हैं, यदि वहां नए विद्रोह नहीं फूट पड़ते, तो विद्रोह धीरे-धीरे शांत होता हुआ अपने उस अंतिम लंबे काल में प्रवेश कर जाएगा जिसमें कि, अंत में, विद्रोही डकैतों या डाकुओं का रूप ले लेंगे। और तब वे देखेंगे कि देश के निवासी भी उनके उतने ही कट्टर शत्रु हैं जैसे कि स्वयं ब्रिटिश।
लखनऊ के हमले का ब्योरा अभी तक प्राप्त नहीं हुआ। लेकिन प्रारंभिक कार्रवाइयों की और अंतिम संघर्षों की रूपरेखाएं ज्ञात हैं। हमारे पाठकों को याद होगा कि लखनऊ की रेजीडेंसी की सहायता करने के बाद जनरल कैंपबेल ने उस सैनिक अड्डे को उड़ा दिया था। लेकिन जनरल आउट्रम को लगभग पांच हजार सैनिकों के साथ उन्होंने आलमबाग में तैनात कर दिया था। यह शहर के कुछ मील के फासले पर एक किलाबंद स्थान था। शेष अपनी फौजों के साथ कैंपबेल स्वयं कानपुर लौट गए थे। वहां पर विद्रोहियों ने जनरल विंढम को हरा दिया था। इन विद्रोहियों को कैंपबेल ने पूर्णतया परास्त कर दिया और जमुना के उस पार कालपी में खदेड़ दिया। इसके बाद सैनिक सहायता और भारी तोपों के आने का कानपुर में वे इंतजार करने लगे। आक्रमण की अपनी योजनाएं उन्होंने तैयार कीं, अवध पर कब्जा करने के लिए जिन सेनाओं को भेजना था उन्हें एक जगह जमा होने के आदेश उन्होंने जारी किए, और कानपुर को एक ऐसा मजबूत और विशाल कैंप बना दिया जिससे कि लखनऊ के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों का वह फौजी और मुख्य अड्डा बन
सके। जब यह सब पूरा हो गया तो एक और काम उन्होंने किया। इस काम को पूरा करने से पहले आगे बढ़ने को वह निरापद नहीं समझते थे। इस काम को पूरा करने की उनकी कोशिश पहले के लगभग तमाम भारतीय कमांडरों से अलग करके उन्हें विशिष्ट बना देती है। कैंपबेल ने कहा कि कैंप में औरतें नहीं चाहिए। लखनऊ में, कानपुर की ओर कूच के समय इन 'वीरांगनाओं' को वह काफी देख चुके थे। ये स्त्रियां इसे बिलकुल स्वाभाविक मानती थीं कि फौज की सारी गतिविधि उनकी इच्छाओं और आराम के विचार को ध्यान में रखकर हो। भारत में हमेशा ऐसा ही होता आया था। कैंपबेल ज्योंही कानुपर पहुंचे, त्योंही उन्होंने इस पूरी दिलचस्प और तकलीफदेह कौम को, अपने रास्ते से दूर, इलाहाबाद भेज दिया। फिर तुरंत ही महिलाओं के उस दूसरे दल को भी उन्होंने बुलवा भेजा जो उस समय आगरे में था। जब तक वे कानपुर नहीं आ गईं और जब तक सकुशल उन्हें भी उन्होंने इलाहाबाद के लिए रवाना नहीं कर दिया, तब तक लखनऊ की तरफ बढ़ रही अपनी फौजों के साथ वह भी आगे नहीं गए।
अवध के इस अभियान के लिए जिस पैमाने पर व्यवस्था की गई थी, वह भारत में अब तक बेमिसाल थी। वहां पर अंगरेजों ने जो सबसे बड़ा अभियान, अफगानिस्तान पर आक्रमण के अभियान समान संगठित किया था। उसमें इस्तेमाल किए जाने वाले सैनिकों की संख्या किसी भी समय 20,000 से अधिक न थी, और उनमें भी बहुत बड़ा बहुमत हिंदुस्तानियों का था। इसके विपरीत, अवध के इस अभियान में केवल यूरोपियनों की संख्या अफगानिस्तान भेजे गए तमाम सैनिकों की संख्या से अधिक थी। मुख्य सेना में, जिसका नेतृत्व सर कॉलिन कैंपबेल स्वयं कर रहे थे, तीन डिवीजन पैदल सेना के थे, एक घुड़सवारों का और एक तोपखाना और एक डिवीजन इंजीनियरों का था। पैदल सेना का पहला डिवीजन, आउट्रम के नेतृत्व में, आलमबाग पर अधिकार किए हुए था। उसमें पांच यूरोपियन और एक देशी रेजीमेंट थी। कैंपबेल की सक्रिया सेना में, जिसे लेकर कानपुर से सड़क के मार्ग से वह आगे बढ़े थे, दूसरे (जिसमें चार यूरोपियन और एक देशी रेजीमेंट थी) और तीसरे (जिसमें पांच यूरोपियन और एक देशी रेजीमेंट थी) डिवीजन थे, सर होप ग्रैंट के नीचे का एक घुड़सवार डिवीजन था (जिसमें तीन यूरोपियन और चार या पांच देशी रेजीमेंटें थीं) और तोपखाने का अधिकांश था (जिसमें अड़तालीस मैदानी तोपें, घेरा डालने वाली गाड़ियां और इंजीनियर थे)। गोमती और गंगा के बीच, जौनपुर और आजमगढ़ में, एक ब्रिगेड ब्रिगेडियर फ्रैंक्स के नेतृत्व में केंद्रित था। उसको गोमती के किनारे-किनारे लखनऊ की ओर बढ़ने का आदेश था। इस ब्रिगेड में देशी सैनिकों के अलावा तीन यूरोपियन रेजीमेंटें और दो बैट्रियां (तोपखाने की टुकड़िया) थीं। इस ब्रिगेड को कैंपबेल के सैनिक अभियान का दाहिना अंग बनाना था। इन्हें लेकर कैंपबेल की सेना में कुछ सैनिक इस प्रकार थे :
                      पैदल सेना    घुड़सवार     तोपखाना और       कुल
                                            इंजीनियर
यूरोपियन     15,000           2,000              3,000                20,000
देशी   5,000    3,000    2,000    10,000
अर्थात, कुल मिलाकर उसमें 30,000 सैनिक थे। इन्हीं में उन 10,000 नेपाली गोरखों को जोड़ देना चाहिए जो जंग बहादुर के नेतृत्व में गोरखपुर से सुलतानपुर की तरफ बढ़ रहे थे। इनको लेकर आक्रमणकारी सेना की कुल संख्या 40,000 सैनिकों की हो जाती है। लगभग ये सब नियमित सैनिक थे। लेकिन बात यहीं नहीं खतम होती। कानपुर के दक्षिण में, एक मजबूत सेना के साथ सर एच. रोज थे। सागर से वह कालपी और जमुना के निचले भाग की ओर बढ़ रहे थे। उनका लक्ष्य यह था कि अगर फ्रैंक्स और कैंपबेल की दोनों सेनाओं के बीच में कुछ लोग भाग निकलें तो वह उन्हें पकड़ लें। उत्तर-पश्चिम में, फरबरी के अंत के करीब ब्रिगेडियर चैंबरलेन ने उत्तर गंगा को पार कर लिया। अवध के उत्तर-पश्चिम में स्थित रुहेलखंड में वह प्रविष्ट हो गया। जैसा कि ठीक ही अनुमान लगाया गया था, विद्रोही सेनाओं के पीछे हटने के लिए मुख्य अड्डा यही जगह तय थी। इर्द-गिर्द से अवध को घेरे रखने वाले शहरों के गैरीसनों को भी उसी सेना में मिला दिया जाना चाहिए जिसने, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, उस राज्य के ऊपर किए गए आक्रमण में भाग लिया था। इस तरह, इस पूरी सेना में निश्चित रूप से 70,000 से 80,000 तक लड़ने वाले हैं। इनमें से, सरकारी वक्तव्यों के अनुसार, कम से कम 28,000 अंगरेज हैं। इस सैनिक शक्ति में सर जॉन लॉरेंस की उस सेना के अधिकांश को नहीं शामिल किया गया है जो दिल्ली में एक प्रकार से बाजू पर अधिकार किए हुए पड़ी है और जिसमें मेरठ और दिल्ली के 5,500 यूरोपियन और 20,000 या 30,000 के करीब पंजाबी हैं।
इस विशाल सैनिक शक्ति का एक जगह केंद्रीकरण कुछ तो जनरल कैंपबेल के व्यूह रचना का परिणाम है, लेकिन कुछ वह इस बात का भी परिणाम है कि हिंदुस्तान के विभिन्न भागों में विद्रोह को कुचल दिया गया है, और इसकी वजह से, स्वाभाविक रूप से सैनिक इस घटनास्थल पर आकर जमा हो गए हैं। इसमें संदेह नहीं कि कैंपबेल इससे कम सैनिक-शक्ति होने पर भी हमला करता; लेकिन, जिस समय वह हमले की तैयारी कर रहा था, उसी समय परिस्थितिवश, उसके पास और भी सैनिकों की नई कुमुक पहुंच गई; और, यह जानते हुए भी कि लखनऊ में उसे कैसे तुच्छ दुश्मन से लड़ना है, ऐसा आदमी वह नहीं था कि इन नए मौकों का फायदा उठाने से इनकार कर देता। और यह बात भी भुलाई नहीं जानी चाहिए कि यद्यपि सैनिकों की यह संख्या बहुत बड़ी लगती है, लेकिन वह फ्रांस के बराबर के बड़े क्षेत्र में फैली हुई थी; और निर्णायक क्षण में केवल लगभग 20,000 यूरोपियनों, 10,000 हिंदुस्तानियों और 10,000 गोरखों को ही लेकर वह लखनऊ पहुंच
सका था। इनमें से भी देशी अफसरों की कमान में काम करने वाले गोरखा सैनिकों की वफादारी, कम से कम संदेहजनक तो थी ही। निस्संदेह, शीघ्र विजय प्राप्त करने के लिए इस सैनिक शक्ति का केवल यूरोपियन भाग ही काफी से अधिक था; लेकिन, फिर भी, उसके सामने जो काम था उसके मुकाबले में उसकी शक्ति बहुत ज्यादा नहीं थी। और, बहुत संभव मालूम पड़ता है कि कैंपबेल की इच्छा यह थी कि, कम से कम एक बार, अवध के लोगों को गोरी फिरंगी फौज की एक इतनी भयावनी तादाद वह दिखा दे जितनी कि भारत मेंजहां विद्रोह इसीलिए संभव हो सका था कि यूरोपियनों की संख्या थोड़ी
थी और देश भर में वे दूर-दूर फैले हुए थेऔर कहीं की जनता ने इससे पहले कभी न देखी थी।
अवध की सेना बंगाल के अधिकांश विद्रोही रेजीमेटों के अवशेषों और उसी इलाके में इकट्ठे किए गए देशी रंगरूटों को लेकर बनी थी। बंगाल के विद्रोही रेजीमेंटों से आए हुए लोगों की संख्या 35,000 या 40,000 से अधिक नहीं हो सकती थी। आरंभ में इस सेना में 80,000 आदमी थे। युध्द की मार-काट, सेना-त्याग और पस्तहिम्मती की वजह से इसकी शक्ति कम से कम आधी घट गई होगी। जो कुछ बच रही थी, वह भी असंगठित थी, आशाविहीन थी, बुरी हालत में थी और युध्द के मोर्चों पर जाने के लिहाज से सर्वथा अयोग्य थी। नई भर्ती की गई फौजों के सैनिकों की संख्या एक लाख से डेढ़ लाख तक बताई जाती है; लेकिन उनकी संख्या कितनी थी यह महत्वहीन है। उनके हथियारों में कुछ बंदूकें थीं, वे भी रद्दी किस्म की। लेकिन उनमें से अधिकांश के पास जो हथियार थे, उनका इस्तेमाल बिलकुल पास की लड़ाई में ही किया जा सकता थाऐसी लड़ाई में जिसकी सबसे कम संभावना थी। इस सैनिक शक्ति का अधिकांश लखनऊ में था जो सर जे. आउट्रम के सैनिकों का मुकाबला कर रहा था; लेकिन उसकी दो टुकड़ियां इलाहाबाद और जौनपुर की दिशा में भी काम कर रही थीं।
लखनऊ को चारों तरफ से घेरने का अभियान फरवरी के मध्य के करीब आरंभ हुआ। 15 से 26 तारीख तक मुख्य सेना और उसके नौकरों-चाकरों की भारी संख्या (जिनमें 60,000 तो केवल सफरी सामान ले चलने वाले अनुचर थे) कानपुर से अवध की राजधानी की तरफ कूच करती रही। रास्ते में उसे कहीं किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसी बीच, 21 और 24 फरवरी को, सफलता की जरा भी आशा के बिना, दुश्मन के आउट्रम वाले मोर्चे पर हमला बोल दिया। 19 तारीख को फ्रैंक्स ने सुलतानपुर पर धावा कर दिया; विद्रोहियों की दोनों सेनाओं को उसने एक ही दिन में हरा दिया; और फिर, घुड़सवारों के अभाव में जितनी भी अच्छी तरह उनका पीछा किया जा सकता उतनी अच्छी तरह से उसने उनका पीछा किया। दोनों पराजित सेनाओं के मिल जाने पर, 23 तारीख को उन्हें फिर उसने हरा दिया। उनकी 20 तोपें और उनका खेमा और सारा सरोसामान इस टक्कर में नष्ट हो गया। जनरल होप ग्रैंट मुख्य सेना के अगले भाग का नेतृत्व कर रहा था। जबरदस्ती कूच के
समय मुख्य सेना से अपने को उसने अलग कर लिया था और बाईं तरफ बढ़ कर, 23 और 24 तारीख को, लखनऊ से रुहेलखंड को जाने वाली सड़क पर स्थित दो किलों को उसने तहस-नहस कर दिया था।
2 मार्च को मुख्य सेना लखनऊ के दक्षिणी भाग में केंद्रित कर दी गई थी। नहर इस भाग की हिफाजत करती है। शहर पर अपने पिछले हमले के समय कैंपबेल को इस नहर को पार करना पड़ा था। इस नहर के पीछे खंदकें खोदकर मजबूत किलेबंदी कर ली गई। 3 तारीख को अंगरेजों ने दिलकुशा पार्क पर कब्जा कर लिया। इस पर कब्जा करने के साथ-साथ पहले आक्रमण का भी श्रीगणेश हो गया था। 4 तारीख को ब्रिगेडियर फ्रैंक्स मुख्य सेना में आ मिला। वह अब उसका दाहिना अंग बन गया। स्वयं उसके दाहिनी तरफ गोमती नदी थी जो उसकी सहायता कर रही थी। इसी बीच दुश्मन की मोर्चेबंदी के खिलाफ बैट्रियां (तोपें) अड़ा दी गईं, और, शहर के आगे, गोमती के आर-पार, दो पानी में तैरने वाले पुल बन लिए गए। ये पुल ज्योंही तैयार हो गए, त्योंही पैदल सेना के अपने डिवीजन, 1,400 घोड़ों और 30 तोपों को लेकर, सर जे. आउट्रम बाईं तरफ, यानी उत्तरी-पूर्वी किनारे पर मोर्चा लगाने के लिए नदी के पार चले गए। इस स्थान से नहर के किनारे-किनारे फैली हुई दुश्मन की सेना के एक बड़े भाग को और उसके पीछे के कई किलाबंद महलों को वह घेर ले सकता था। यहां पहुंचकर अवध के पूरे उत्तर-पूर्वी भाग के साथ दुश्मन के संचार साधनों को भी उसने काट दिया। 6 और 7 तारीख को उसे काफी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन दुश्मन को उसने सामने से मार भगाया। 8 तारीख को उसके ऊपर फिर हमला हुआ, पर इसमें भी दुश्मन को कोई सफलता नहीं मिली। इसी बीच, दाहिने तट की बैट्रियों ने गोलंदाजी शुरू कर दी थी। नदी के तट पर स्थित आउट्रम की बैट्रियों ने विद्रोहियों के बाजू और पिछवाड़े पर प्रहार करना शुरू कर दिया। 9 तारीख को सर ई. लुगर्ड के मातहत दूसरे डिवीजन ने मारटीनियर पर धावा करके अपने अधिकार में ले लिया। यह, जैसा कि हमारे पाठकों को याद होगा, दिलकुशा के सामने, नहर के दक्षिण भाग में, जहां यह नहर गोमती से मिलती है, एक कालेज और पार्क है। 10 तारीख को बैंक घर सेंध लगा दी गई और उस पर कब्जा कर लिया गया। आउट्रम नदी के किनारे-किनारे और आगे बढ़ता गया और विद्रोही जहां भी पड़ाव डालते, वहीं अपनी तोपों से उनको वह भूनने लगता। 11 तारीख को दो पहाड़ी रेजीमेंटों ने (42वीं और 93वीं रेजीमेंटों ने) बेगम के महल पर हमला कर दिया और आउट्रम ने, नदी के बाएं किनारे से, शहर जाने वाले पत्थर के पुल पर हमला बोल दिया और आगे बढ़ गया। फिर अपने सैनिकों को उसने नदी के पार उतार दिया और सामने की अगली इमारत के बरक्स हमले में शामिल हो गया। 13 मार्च को एक दूसरी किलाबंद इमारत, इमामबाड़े पर हमला किया गया। तोपखाने को सुरक्षित स्थान में खड़ा करने के लिए एक खाई खोद ली गई थी और, अगले दिन सेंध के तैयार होते ही इस इमारत पर धावा करके कब्जा कर लिया गया। कैसरबाग, यानी बादशाह के महल की तरफ भागते
हुए दुश्मन का पीछा इतनी तेजी से किया गया कि भगोड़ों के पीछे-पीछे गोरी फौज भी उसके अंदर घुस गई। एक हिंसापूर्ण संघर्ष शुरू हो गया, लेकिन तीसरे पहर तीन बजे तक महल अंगरेजों के कब्जे में आ गया था। लगता है कि इसके बाद संकट पैदा हो गया। कम से कम प्रतिरोध की सारी भावना खतम हो गई और कैंपबेल ने भागने वाले लोगों का पीछा करने और उन्हें पकड़ने की कार्रवाइयां फौरन शुरू कर दीं। घुड़सवारों के एक ब्रिगेड और घुड़सवार तोपखाने की कुछ तोपों के साथ ब्रिगेडियर कैंपबेल को उनका पीछा करने के लिए भेजा गया। इधर ग्रैंट एक दूसरे ब्रिगेड को लेकर विद्रोहियों को पकड़ने के लिए लखनऊ से रुहेलखंड के मार्ग पर सीतापुर की ओर चल पड़े। इस प्रकार गैरीसन के उस भाग को, जो भाग खड़ा हुआ था, ठिकाने लगाने की व्यवस्था करके पैदल सेना तोपखाना समेत शहर के भीतर उन लोगों का सफाया करने के लिए आगे बढ़ी जो अब भी वहां जमे हुए थे। 15 से 19 तारीख तक लड़ाई मुख्यतया शहर की संकरी गलियों में ही होती रही होगी, क्योंकि नदी के किनारे के हमलों और बागों पर तो पहले ही कब्जा कर लिया गया था। 19 तारीख को पूरा शहर कैंपबेल के अधिकार में था। कहा जाता है कि लगभग 50,000 विद्रोही भाग गए हैं, कुछ रुहेलखंड की तरफ, कुछ दोआब और बुंदेलखंड की तरफ। दोआब और बुंदेलखंड की दिशा में भागने का मौका उन्हें इसलिए मिला कि जनरल रोज अपनी सेना के साथ जमुना से अब भी कम से कम 60 मील की दूरी पर हैं, और कहा जाता है कि, 30,000 विद्रोही उनके सामने हैं। रुहेलखंड की दिशा में विद्रोहियों के लिए फिर इकट्ठा हो सकने का भी एक अवसर था, क्योंकि कैंपबेल इस स्थिति में नहीं होंगे कि बहुत तेजी से उनका पीछा कर सकें और चैंबरलेन कहां है, इसके बारे में किसी को कोई खबर नहीं है। इसके अतिरिक्त, इलाका काफी बड़ा है और कुछ समय के लिए उन्हें मजे में पनाह दे सकता है। इसलिए विद्रोह का नया रूप संभवत: यह शक्ल अख्तियार करे कि बुंदेलखंड और रुहेलखंड में दो विद्रोही सेनाएं संगठित हो जाएं। लेकिन लखनऊ और दिल्ली की सेनाएं रुहेलखंड की तरफ कूच करके रुहेलखंड की सेना का जल्दी ही सफाया कर सकती हैं।
इस अभियान में सर सी. कैंपबेल की कारवाइयां, जहां तक हम अभी उनको समझ सकते हैं, उसी बुध्दिमानी और तेजी के साथ संगठित की गई थीं जिससे वे अब तक आम तौर पर उन्हें संगठित करते आए हैं। लखनऊ को चारों तरफ से घेरने के लिए सेनाओं का व्यूह बहुत अच्छी तरह से तैयार किया गया था। मालूम होता है कि हमले के संबंध में हर परिस्थिति का पूरा-पूरा लाभ उठाया गया था। दूसरी तरफ, विद्रोहियों का आचरण अगर ज्यादा नहीं तो पहले के समान ही हेय था। लाल कोटों को देखते ही उनके अंदर हर जगह भय छा गया। फ्रैंक्स की सेना ने अपने से 20 गुनी अधिक सेना को पराजित कर दिया और उसका एक भी आदपी खेत नहीं रहा। जो तार आए हैं वे यद्यपि, हमेशा की तरह, 'सख्त प्रतिरोध' और 'जबरदस्त लड़ाई' की ही बातें करते हैं, लेकिन अंगरेजों को हुआ नुकसान >जहां वह बताया गया हैहास्यास्पद रूप से इतना कम है कि हमारा खयाल है कि इस बार भी उन्हें लखनऊ में उससे ज्यादा बहादुरी दिखलाने की जरूरत नहीं थी जितनी उन्होंने तब दिखलाई थी जब अंगरेज पहले वहां पहुंच थे। और न उससे अधिक यश ही उन्होंने इस बार प्राप्त किया है।
(30 अप्रैल 1858 न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5312, में
एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)
 साभार : नया जमाना

भारत में विद्रोह- फ्रेडरिक एंगेल्स


गर्मी और वर्षा के गर्म महीनों में भारत का अभियान लगभग पूर्ण रूप में स्थगित कर दिया गया है। सर कॉलिन कैंपबेल ने एक शाक्तिशाली प्रयास के द्वारा अवध और रुहेलखंड के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर गर्मी के प्रारंभ में ही अधिकार कर लिया था। उसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को छावनी में रख दिया है और बाकी देश को खुले तौर पर बागियों के कब्जे में छोड़ दिया है। और अपनी कोशिशों को वे संचार के अपने साधनों को बनाए रखने तक ही सीमित रख रहे हैं। इस काल में महत्व की जो एकमात्र घटना अवध में हुई है, वह है मान सिंह की सहायता के लिए सर होप ग्रैंट का शाहगंज के लिए अभियान। मान सिंह एक ऐसा देशी राजा है जिसने काफी हीले-हवाले के बाद कुछ ही समय पहले अंगरेजों के साथ समझौता कर लिया था और अब उसके पुराने देशी मित्रों ने उसे घेर लिया था। यह अभियान केवल एक सैनिक सैर के समान सिध्द हुआ-यद्यपि लू और हैजे की वजह से अंगरेजों का उसमें भारी नुकसान हुआ होगा। देशी लोग बिना मुकाबला किए ही तितर-बितर हो गए और मान सिंह अंगरेजों से जा मिला। इतनी सरलता से प्राप्त हुई इस सफलता से यद्यपि यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा अवध इसी प्रकार आसानी से अंगरेजों के सामने नत-मस्तक हो जाएगा, लेकिन इससे यह तो मालूम ही हो जाता है कि बागियों की हिम्मत एकदम टूट गई है। अंगरेजों के हित में यदि यह था कि गर्मी के मौसम में आराम करें, तो विल्पकारियों के हित में यह था कि वे उन्हें अधिक से अधिक परेशान करें। लेकिन इसके बजाए कि वे सक्रिय रूप से छापामार युध्द का संगठन करें, दुश्मन ने जिन शहरों पर अधिकार कर रखा है उनके बीच के उसके संचार-साधनों को छिन्न-विच्छिन्न करें, उसकी छोटी-छोटी टुकड़ियों को घात लगाकर रास्ते में ही साफ कर दें, दाना-पानी की खोज करने वाले उसके दलों को हलकान कर दें, रसद की सप्लाई के काम को नामुमकिन बना दें, अर्थात उन सब चीजों का आना-जाना एकदम रोक दें जिनके बिना अंगरेजों के कब्जे का कोई भी बड़ा शहर जिंदा नहीं रह सकता हैइन सब चीजों को करने के बजाए, देशी लोग लगान वसूल करने और उसके दुश्मनों ने जो थोडी सी मोहलत उन्हें दे दी है, उसका उपभोग करने में ही वे प्रसन्न हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि, मालूम होता है कि, वे आपस में लड़ भी गए हैं। न ही ऐसा मालूम होता है कि इन चंद शांतिपूर्ण हफ्तों का उपयोग उन्होंने अपनी शक्तियों को पुनर्संगठित करने, गोला-बारूद के अपने भंडारों को फिर से भरने, अथवा नष्ट हो गई तोपों की जगह दूसरी तोपें इकट्ठा करने के ही काम में किया है। शाहगंज की उनकी भगदड़ प्रकट करती है कि पहले की किसी भी पराजय की अपेक्षा अब उनका विश्वास अपने में और अपने नेताओं में और भी कम हो गया है। इसी बीच अधिकांश राजे-रजवाड़ों और ब्रिटिश सरकार के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा है। ब्रिटिश सरकार ने, आखिरकार, देख लिया है कि अवध की पूरी सरजमीन को हड़प जाना उनके लिए एक अव्यावहारिक सा काम है और इसलिए इस बात के लिए वह अच्छी तरह राजी हो गई है कि उचित शर्तों पर उसे फिर उसके पुराने स्वामियों को लौटा दी जाए। इस भांति, अंगरेजों को अंतिम विजय के संबंध में अब कोई संदेह नहीं रह गया है और इसलिए लगता है कि अवध का विद्रोह सक्रिय छापामार युध्द के दौर से गुजरे बिना ही खतम हो जाएगा। अधिकांश जमींदार-ताल्लुकेदार अंगरेजों के साथ ज्योंही समझौता कर लेंगे, त्योंही विप्लवकारियों के दल छिन्न-भिन्न हो जाएंगे और जिन लोगों को सरकार का बहुत ज्यादा डर है वे डाकू बन जाएंगे और उन्हें पकड़वाने में फिर किसान भी सरकार को खुशी-खुशी मदद देंगे।
अवध के दक्षिण-पश्चिम में जगदीशपुर के जंगल इस तरह के डकैतों के लिए एक अच्छा आश्रय-स्थल मालूम पड़ते हैं। बांसों और झाड़ियों के इन अभेद्य जंगलों पर अमर सिंह के नेतृत्व में विप्लवकारियों के एक दल का कब्जा है। अमर सिंह को छापामार युध्द का अधिक ज्ञान है, ऐसा मालूम होता है और वह क्रियाशील भी अधिक है। जो कुछ भी हो, चुपचाप इंतजार करने के बजाए जब भी मौका मिलता है वह अंगरेजों के ऊपर हमला बोल देता है। उस सुदृढ़ अड्डे से भगाए जाने से पहले ही उसके पास जाकर अवध के विद्रोहियों का एक भाग भी अगर मिल गया जैसी कि आशंका है तो अंगरेजों के लिए मुसीबत हो जाएगी और उनका काम बहुत बढ़ जाएगा। लगभग 8 महीनों से ये जंगल विप्लवकारी दलों के लिए छिपने और विश्राम करने के स्थल बने हुए हैं। इन दलों ने कलकत्ता और इलाहाबाद के बीच की सड़क, ग्रैंड टं्रक रोड को, जो अंगरेजों का मुख्य संचार मार्ग है, अत्यंत असुरक्षित बना दिया है।
पश्चिमी भारत में जनरल रौबट्र्स और कर्नल होम्स अब भी ग्वालियर के विद्रोहियों का पीछा कर रहे हैं। ग्वालियर पर जिस समय कब्जा किया गया, उस समय यह प्रश्न बहुत महत्व का था कि पीछे हटती हुई सेना कौन सी दिशा अपनाएगी; क्योंकि मराठों का पूरा देश और राजपूताने का एक भाग मानो विद्रोह के लिए तैयार बैठा थाइंतजार बस वह इस बात का कर रहा था कि नियमित सैनिकों की एक मजबूत सेना पहुंच जाए जिससे कि विद्रोह का एक अच्छा केंद्र वहां कायम हो जाए। उस वक्त लगता था कि इस लक्ष्य की प्राप्ति की दृष्टि से सबसे अधिक संभावना इसी बात की दिखलाई देती थी कि ग्वालियर की फौजें पैंतरा बदलकर होशियारी से दक्षिण-पश्चिमी दिशा की ओर निकल जाएंगी। लेकिन विप्लवकारियों ने पीछे हटने के लिए उत्तर-पश्चिमी दिशा को चुना है। ऐसा उन्होंने किन कारणों से किया है, इसका उन रिपोर्टों से हम अनुमान नहीं लगा सकते जो हमारे सामने हैं। वे जयपुर गए, वहां से दक्षिण उदयपुर की तरफ घूम गए और मराठों के प्रदेश में पहुंचने वाले मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे। लेकिन इस चक्करदार रास्ते की वजह से रौबट्र्स को यह मौका मिल गया कि वह उनको जा पकड़े। रौबट्र्स उनके पास पहुंच गया और बिना किसी बड़े प्रयास के ही, उसने उन्हें पूरे तौर से हरा दिया। इस सेना के जो अवशेष बचे हैं, उनके पास न तोपें हैं, न संगठन और न गोला-बारूद हैं, न कोई नामी नेता है। नए विद्रोह खड़े कर सकेंऐसे ये लोग नहीं हैं। इसके विपरीत मालूम होता है कि लूट-खसोट में प्राप्त चीजों की जो विशाल मात्रा वे अपने साथ ले जा रहे हैं और जिसकी वजह से उनकी तमाम गतिविधि में बाधा पड़ रही है, उसने किसानों की लोलुपता को जगा दिया है। अलग-थलग घूमते-भटकते हर सिपाही को मार दिया जाता है और सोने की मोहरों के भार से उसे मुक्त कर दिया जाता है। स्थिति अगर यही रही, तो इन सिपाहियों को अंतिम रूप से ठिकाने लगाने के काम को जनरल रौबट्र्स बड़े मजे में अब देहाती जनता के जिम्मे छोड़ दे सकता है। सिंधिया के खजाने को उसके सिपाहियों ने लूट लिया है; इससे अंगरेजों के लिए
हिंदुस्तान से भी अधिक खतरनाक एक दूसरे क्षेत्र में विद्रोह के फिर से शुरू हो जाने का खतरा मिट गया है। यह क्षेत्र अंगरेजों के लिए बहुत खतरनाक था, क्योंकि मराठों के प्रदेश में विद्रोह शुरू हो जाने पर बंबई की फौज के लिए बड़ी ही कठोर परीक्षा का समय आ जाता।
ग्वालियर के पड़ोस में एक नई बंगावत उठ खड़ी हुई है। एक छोटा सरदारमान सिंह (अवध का मान सिंह नहीं), जो सिंधिया के अधीन था, विप्लवकारियों के साथ जा मिला है और पौड़ी के छोटे किले पर उसने कब्जा कर लिया है। लेकिन उस जगह को अंगरेजों ने घेर लिया है और जल्द ही उस पर कब्जा हो जाना चाहिए।
इस बीच, जीते गए इलाके धीरे-धीरे शांत होते जा रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली के पास-पड़ोस के इलाके में सर जे. लॉरेंस ने ऐसी पूर्ण शांति कायम कर दी है कि कोई भी यूरोपियन अब वहां बिना हथियार के और बिना अंगरक्षकों को लिए पूर्ण सुरक्षा के साथ इधर-उधर आ-जा सकता है। इसका रहस्य यह है कि किसी गांव के क्षेत्र में होने वाले हर जुर्म अथवा बलवे के लिए उस गांव की जनता को अंगरेजों ने सामूहिक रूप से जिम्मेदार बना दिया है; उन्होंने एक फौजी पुलिस संगठित कर दी है; और इस सबसे भी अधिक हर जगह कोर्ट मॉर्शल द्वारा आनन-फानन में सजा देने की व्यवस्था कायम होर् गई। पूर्व के लोगों पर कोर्ट मॉर्शल की व्यवस्था का कुछ खास ही रौब पड़ता है। फिर भी यह सफलता एक अपवाद जैसी मालूम होती है, क्योंकि दूसरे क्षेत्रों से तरह की कोई चीज हमें सुनाई नहीं देती। रुहेलखंड और अवध को, बुंदेलखंड और दूसरे अनेक बड़े प्रांतों को पूर्णतया शांत करने के काम के लिए अब भी बहुत लंबे समय की जरूरत होगी और उसके सिलसिले में अंगरेजी सैनिकों और कोर्ट मॉर्शलों को अब भी बहुत काम करना पड़ेगा।
लेकिन जहां हिंदुस्तान के विद्रोह का विस्तार इतना छोटा हो गया है कि अब उसमें फौजी दिलचस्पी की कोई चीज नहीं रह गई है, वहीं वहां से काफी दूरअफगानिस्तान के अंतिम सीमांतों परएक ऐसी घटना हो गई है जिसमें आगे चलकर भारी कठिनाइयां उत्पन्न होने की आशंका छिपी हुई है। डेरा इस्माइल खान में स्थित कई सिख रेजीमेंटों में अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह करने और अपने अफसरों की हत्या कर देने के एक षडयंत्र का पता लगा है। इस षडयंत्र की जड़ें कितनी दूर तक फैली हुई हैं, यह हम नहीं बता सकते। संभव है कि वह केवल एक स्थानीय चीज हो जिसका सिखों के एक खास वर्ग से सबंध हो। लेकिन इस बात को हम साधिकार नहीं कह सकते। कुछ भी हो, यह बहुत ही खतरनाक लक्षण है। ब्रिटिश सेना में इस समय लगभग 1,00,000 सिख हैं, और यह तो हम सुन ही चुके हैं कि वे कितने उद्दंड हैं। वे कहते हैं कि आज वे अंगरेजों की तरफ से लड़ते हैं, पर अगर भगवान की ऐसी ही मर्जी हुई तो कल उनके खिलाफ भी लड़ सकते हैं! वे बहादुर होते हैं, जोशीले होते हैं, अस्थिर होते हैं और दूसरे पूर्वी लोगों से भी अधिक आकस्मिक और अन-अपेक्षित आवेगों के शिकार हो जाते हैं। यदि सचमुच उनके अंदर बंगावत शुरू हो जाए, तब फिर अंगरेजों के लिए अपने को बचाए रखने का काम कठिन हो जाएगा। भारत के निवासियों में सिख हमेशा अंगरेजों के सबसे कट्टर विरोधी रहे हैं; अपेक्षाकृत एक काफी शक्तिशाली साम्राज्य की उन्होंने स्थापना कर ली है; वे ब्राह्मणों के एक खास संप्रदाय के हैं और हिंदुओं और मुसलमानों दोनों से नफरत करते हैं। ब्रिटिश 'राज' को वे अधिकतम खतरे के समय देख चुके हैं, उसकी पुनर्स्थापना के कार्य में उन्होंने बहुत योग दिया है, और उन्हें तो इस बात का भी पूरा विश्वास है कि उनका योग ही वह निर्णायक चीज थी जिसने ब्रिटिश राज्य को बचा लिया है। तब फिर इससे अधिक स्वाभाविक और क्या हो सकता है यदि वे यह सोचें कि ब्रिटिश राज्य की जगह अब सिख राज्य की स्थापना कर दी जानी चाहिए, दिल्ली या कलकत्ते की गद्दी पर भारत का शासन करने के लिए किसी सिख सम्राट का अभिषेक कर दिया जाना चाहिए? संभव है कि यह विचार अभी तक सिखों के अंदर बहुत परिपक्व न हुआ हो, यह भी संभव है कि उन्हें होशियारी से इस तरह अलग-अलग वितरित कर दिया जाए कि हर जगह उनका मुकाबला करने के लिए काफी यूरोपियन मौजूद रहें जिससे कि कहीं भी विद्रोह होने पर उन्हें आसानी से दबा दिया जा सके। लेकिन यह विचार अब उनके अंदर आ गया है, यह चीज, हमारे, खयाल के मुताबिक, हर उस व्यक्ति को स्पष्ट होगी जिसने पढ़ा है कि दिल्ली और लखनऊ के बाद से सिखों के क्या रंग-ढंग हैं।
लेकिन, फिलहाल, भारत को अंगरेजों ने फिर जीत लिया है। वह महान विद्रोह जिसकी चिनगारी बंगाल की सेना की बंगावत से उठी थी, लगता है, सचमुच ही खतम हो रहा है। लेकिन इस दोबारा विजय से इंगलैंड भारतीय जनता के मन पर अपना प्रभाव नहीं बैठा सका है। देशियों द्वारा किए जाने वाले अनाचारों-अत्याचारों की बढ़ी-चढ़ी और झूठी रिपोर्टों से क्रुध्द होकर अंगरेजी फौजों ने बदले की कार्रवाई के तहत जो बर्बर और जघन्य कार्य किए हैं, उनकी क्रूरता ने और अवध के राज्य को पूरे तौर से और टुकड़े-टुकड़े करके, दोनों तरफ से, हड़प लेने की उनकी कोशिशों ने विजेताओं के लिए कोई खास प्रेम की भावना नहीं पैदा की है। इसके विपरीत, अंगरेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि हिंदुओं और मुमलमानों दोनों के अंदर ईसाई आक्रमणकारी के विरुध्द पुश्तैनी घृणा की भावना आज हमेशा से ही अधिक तीव्र है। यह घृणा इस समय भले ही दुर्बल हो, लेकिन जब तक सिखों के पंजाब के सिर पर भयानक बादल मंडरा रहा है, तब तक उसे महत्वहीन और निरर्थक नहीं कहा जा सकता। बात इतनी ही नहीं है। दोनों महान एशियाई ताकतें इंगलैंड और रूसइस समय साइबेरिया और भारत के बीच एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गई हैं जहां रूसियों और अंगरेजों के स्वार्थों में सीधी टक्कर होना अनिवार्य है। वह बिंदु पीकिंग है। वहां से पश्चिम की और पूरे एशियाई महाद्वीप पर, एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक ऐसी रेखा जल्द ही खींच दी जाएगी जिस पर इन दो विरोधी स्वार्थों के बीच निरंतर संघर्ष होता रहेगा। इस प्रकार, वास्तव में संभव है कि वह समय बहुत दूर न हो जब व्यास नदी के मैदानों में अगेरजी फौज और कज्जाक का मुकाबला हो जाए। और अगर यह मुकाबला होना है, तो 1,50,000 देशी भारतीयों की उत्कट ब्रिटिश-विरोधी भावनाएं गंभीर चिंता का विषय बन जाएंगी।
(1 अक्टूबर 1858 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 1443, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)
 साभार : नया जमाना

भारत में विद्रोह- फ्रेडरिक एंगेल्स


गर्मी और वर्षा के गर्म महीनों में भारत का अभियान लगभग पूर्ण रूप में स्थगित कर दिया गया है। सर कॉलिन कैंपबेल ने एक शाक्तिशाली प्रयास के द्वारा अवध और रुहेलखंड के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर गर्मी के प्रारंभ में ही अधिकार कर लिया था। उसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को छावनी में रख दिया है और बाकी देश को खुले तौर पर बागियों के कब्जे में छोड़ दिया है। और अपनी कोशिशों को वे संचार के अपने साधनों को बनाए रखने तक ही सीमित रख रहे हैं। इस काल में महत्व की जो एकमात्र घटना अवध में हुई है, वह है मान सिंह की सहायता के लिए सर होप ग्रैंट का शाहगंज के लिए अभियान। मान सिंह एक ऐसा देशी राजा है जिसने काफी हीले-हवाले के बाद कुछ ही समय पहले अंगरेजों के साथ समझौता कर लिया था और अब उसके पुराने देशी मित्रों ने उसे घेर लिया था। यह अभियान केवल एक सैनिक सैर के समान सिध्द हुआ-यद्यपि लू और हैजे की वजह से अंगरेजों का उसमें भारी नुकसान हुआ होगा। देशी लोग बिना मुकाबला किए ही तितर-बितर हो गए और मान सिंह अंगरेजों से जा मिला। इतनी सरलता से प्राप्त हुई इस सफलता से यद्यपि यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा अवध इसी प्रकार आसानी से अंगरेजों के सामने नत-मस्तक हो जाएगा, लेकिन इससे यह तो मालूम ही हो जाता है कि बागियों की हिम्मत एकदम टूट गई है। अंगरेजों के हित में यदि यह था कि गर्मी के मौसम में आराम करें, तो विल्पकारियों के हित में यह था कि वे उन्हें अधिक से अधिक परेशान करें। लेकिन इसके बजाए कि वे सक्रिय रूप से छापामार युध्द का संगठन करें, दुश्मन ने जिन शहरों पर अधिकार कर रखा है उनके बीच के उसके संचार-साधनों को छिन्न-विच्छिन्न करें, उसकी छोटी-छोटी टुकड़ियों को घात लगाकर रास्ते में ही साफ कर दें, दाना-पानी की खोज करने वाले उसके दलों को हलकान कर दें, रसद की सप्लाई के काम को नामुमकिन बना दें, अर्थात उन सब चीजों का आना-जाना एकदम रोक दें जिनके बिना अंगरेजों के कब्जे का कोई भी बड़ा शहर जिंदा नहीं रह सकता हैइन सब चीजों को करने के बजाए, देशी लोग लगान वसूल करने और उसके दुश्मनों ने जो थोडी सी मोहलत उन्हें दे दी है, उसका उपभोग करने में ही वे प्रसन्न हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि, मालूम होता है कि, वे आपस में लड़ भी गए हैं। न ही ऐसा मालूम होता है कि इन चंद शांतिपूर्ण हफ्तों का उपयोग उन्होंने अपनी शक्तियों को पुनर्संगठित करने, गोला-बारूद के अपने भंडारों को फिर से भरने, अथवा नष्ट हो गई तोपों की जगह दूसरी तोपें इकट्ठा करने के ही काम में किया है। शाहगंज की उनकी भगदड़ प्रकट करती है कि पहले की किसी भी पराजय की अपेक्षा अब उनका विश्वास अपने में और अपने नेताओं में और भी कम हो गया है। इसी बीच अधिकांश राजे-रजवाड़ों और ब्रिटिश सरकार के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा है। ब्रिटिश सरकार ने, आखिरकार, देख लिया है कि अवध की पूरी सरजमीन को हड़प जाना उनके लिए एक अव्यावहारिक सा काम है और इसलिए इस बात के लिए वह अच्छी तरह राजी हो गई है कि उचित शर्तों पर उसे फिर उसके पुराने स्वामियों को लौटा दी जाए। इस भांति, अंगरेजों को अंतिम विजय के संबंध में अब कोई संदेह नहीं रह गया है और इसलिए लगता है कि अवध का विद्रोह सक्रिय छापामार युध्द के दौर से गुजरे बिना ही खतम हो जाएगा। अधिकांश जमींदार-ताल्लुकेदार अंगरेजों के साथ ज्योंही समझौता कर लेंगे, त्योंही विप्लवकारियों के दल छिन्न-भिन्न हो जाएंगे और जिन लोगों को सरकार का बहुत ज्यादा डर है वे डाकू बन जाएंगे और उन्हें पकड़वाने में फिर किसान भी सरकार को खुशी-खुशी मदद देंगे।
अवध के दक्षिण-पश्चिम में जगदीशपुर के जंगल इस तरह के डकैतों के लिए एक अच्छा आश्रय-स्थल मालूम पड़ते हैं। बांसों और झाड़ियों के इन अभेद्य जंगलों पर अमर सिंह के नेतृत्व में विप्लवकारियों के एक दल का कब्जा है। अमर सिंह को छापामार युध्द का अधिक ज्ञान है, ऐसा मालूम होता है और वह क्रियाशील भी अधिक है। जो कुछ भी हो, चुपचाप इंतजार करने के बजाए जब भी मौका मिलता है वह अंगरेजों के ऊपर हमला बोल देता है। उस सुदृढ़ अड्डे से भगाए जाने से पहले ही उसके पास जाकर अवध के विद्रोहियों का एक भाग भी अगर मिल गया जैसी कि आशंका है तो अंगरेजों के लिए मुसीबत हो जाएगी और उनका काम बहुत बढ़ जाएगा। लगभग 8 महीनों से ये जंगल विप्लवकारी दलों के लिए छिपने और विश्राम करने के स्थल बने हुए हैं। इन दलों ने कलकत्ता और इलाहाबाद के बीच की सड़क, ग्रैंड टं्रक रोड को, जो अंगरेजों का मुख्य संचार मार्ग है, अत्यंत असुरक्षित बना दिया है।
पश्चिमी भारत में जनरल रौबट्र्स और कर्नल होम्स अब भी ग्वालियर के विद्रोहियों का पीछा कर रहे हैं। ग्वालियर पर जिस समय कब्जा किया गया, उस समय यह प्रश्न बहुत महत्व का था कि पीछे हटती हुई सेना कौन सी दिशा अपनाएगी; क्योंकि मराठों का पूरा देश और राजपूताने का एक भाग मानो विद्रोह के लिए तैयार बैठा थाइंतजार बस वह इस बात का कर रहा था कि नियमित सैनिकों की एक मजबूत सेना पहुंच जाए जिससे कि विद्रोह का एक अच्छा केंद्र वहां कायम हो जाए। उस वक्त लगता था कि इस लक्ष्य की प्राप्ति की दृष्टि से सबसे अधिक संभावना इसी बात की दिखलाई देती थी कि ग्वालियर की फौजें पैंतरा बदलकर होशियारी से दक्षिण-पश्चिमी दिशा की ओर निकल जाएंगी। लेकिन विप्लवकारियों ने पीछे हटने के लिए उत्तर-पश्चिमी दिशा को चुना है। ऐसा उन्होंने किन कारणों से किया है, इसका उन रिपोर्टों से हम अनुमान नहीं लगा सकते जो हमारे सामने हैं। वे जयपुर गए, वहां से दक्षिण उदयपुर की तरफ घूम गए और मराठों के प्रदेश में पहुंचने वाले मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे। लेकिन इस चक्करदार रास्ते की वजह से रौबट्र्स को यह मौका मिल गया कि वह उनको जा पकड़े। रौबट्र्स उनके पास पहुंच गया और बिना किसी बड़े प्रयास के ही, उसने उन्हें पूरे तौर से हरा दिया। इस सेना के जो अवशेष बचे हैं, उनके पास न तोपें हैं, न संगठन और न गोला-बारूद हैं, न कोई नामी नेता है। नए विद्रोह खड़े कर सकेंऐसे ये लोग नहीं हैं। इसके विपरीत मालूम होता है कि लूट-खसोट में प्राप्त चीजों की जो विशाल मात्रा वे अपने साथ ले जा रहे हैं और जिसकी वजह से उनकी तमाम गतिविधि में बाधा पड़ रही है, उसने किसानों की लोलुपता को जगा दिया है। अलग-थलग घूमते-भटकते हर सिपाही को मार दिया जाता है और सोने की मोहरों के भार से उसे मुक्त कर दिया जाता है। स्थिति अगर यही रही, तो इन सिपाहियों को अंतिम रूप से ठिकाने लगाने के काम को जनरल रौबट्र्स बड़े मजे में अब देहाती जनता के जिम्मे छोड़ दे सकता है। सिंधिया के खजाने को उसके सिपाहियों ने लूट लिया है; इससे अंगरेजों के लिए
हिंदुस्तान से भी अधिक खतरनाक एक दूसरे क्षेत्र में विद्रोह के फिर से शुरू हो जाने का खतरा मिट गया है। यह क्षेत्र अंगरेजों के लिए बहुत खतरनाक था, क्योंकि मराठों के प्रदेश में विद्रोह शुरू हो जाने पर बंबई की फौज के लिए बड़ी ही कठोर परीक्षा का समय आ जाता।
ग्वालियर के पड़ोस में एक नई बंगावत उठ खड़ी हुई है। एक छोटा सरदारमान सिंह (अवध का मान सिंह नहीं), जो सिंधिया के अधीन था, विप्लवकारियों के साथ जा मिला है और पौड़ी के छोटे किले पर उसने कब्जा कर लिया है। लेकिन उस जगह को अंगरेजों ने घेर लिया है और जल्द ही उस पर कब्जा हो जाना चाहिए।
इस बीच, जीते गए इलाके धीरे-धीरे शांत होते जा रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली के पास-पड़ोस के इलाके में सर जे. लॉरेंस ने ऐसी पूर्ण शांति कायम कर दी है कि कोई भी यूरोपियन अब वहां बिना हथियार के और बिना अंगरक्षकों को लिए पूर्ण सुरक्षा के साथ इधर-उधर आ-जा सकता है। इसका रहस्य यह है कि किसी गांव के क्षेत्र में होने वाले हर जुर्म अथवा बलवे के लिए उस गांव की जनता को अंगरेजों ने सामूहिक रूप से जिम्मेदार बना दिया है; उन्होंने एक फौजी पुलिस संगठित कर दी है; और इस सबसे भी अधिक हर जगह कोर्ट मॉर्शल द्वारा आनन-फानन में सजा देने की व्यवस्था कायम होर् गई। पूर्व के लोगों पर कोर्ट मॉर्शल की व्यवस्था का कुछ खास ही रौब पड़ता है। फिर भी यह सफलता एक अपवाद जैसी मालूम होती है, क्योंकि दूसरे क्षेत्रों से तरह की कोई चीज हमें सुनाई नहीं देती। रुहेलखंड और अवध को, बुंदेलखंड और दूसरे अनेक बड़े प्रांतों को पूर्णतया शांत करने के काम के लिए अब भी बहुत लंबे समय की जरूरत होगी और उसके सिलसिले में अंगरेजी सैनिकों और कोर्ट मॉर्शलों को अब भी बहुत काम करना पड़ेगा।
लेकिन जहां हिंदुस्तान के विद्रोह का विस्तार इतना छोटा हो गया है कि अब उसमें फौजी दिलचस्पी की कोई चीज नहीं रह गई है, वहीं वहां से काफी दूरअफगानिस्तान के अंतिम सीमांतों परएक ऐसी घटना हो गई है जिसमें आगे चलकर भारी कठिनाइयां उत्पन्न होने की आशंका छिपी हुई है। डेरा इस्माइल खान में स्थित कई सिख रेजीमेंटों में अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह करने और अपने अफसरों की हत्या कर देने के एक षडयंत्र का पता लगा है। इस षडयंत्र की जड़ें कितनी दूर तक फैली हुई हैं, यह हम नहीं बता सकते। संभव है कि वह केवल एक स्थानीय चीज हो जिसका सिखों के एक खास वर्ग से सबंध हो। लेकिन इस बात को हम साधिकार नहीं कह सकते। कुछ भी हो, यह बहुत ही खतरनाक लक्षण है। ब्रिटिश सेना में इस समय लगभग 1,00,000 सिख हैं, और यह तो हम सुन ही चुके हैं कि वे कितने उद्दंड हैं। वे कहते हैं कि आज वे अंगरेजों की तरफ से लड़ते हैं, पर अगर भगवान की ऐसी ही मर्जी हुई तो कल उनके खिलाफ भी लड़ सकते हैं! वे बहादुर होते हैं, जोशीले होते हैं, अस्थिर होते हैं और दूसरे पूर्वी लोगों से भी अधिक आकस्मिक और अन-अपेक्षित आवेगों के शिकार हो जाते हैं। यदि सचमुच उनके अंदर बंगावत शुरू हो जाए, तब फिर अंगरेजों के लिए अपने को बचाए रखने का काम कठिन हो जाएगा। भारत के निवासियों में सिख हमेशा अंगरेजों के सबसे कट्टर विरोधी रहे हैं; अपेक्षाकृत एक काफी शक्तिशाली साम्राज्य की उन्होंने स्थापना कर ली है; वे ब्राह्मणों के एक खास संप्रदाय के हैं और हिंदुओं और मुसलमानों दोनों से नफरत करते हैं। ब्रिटिश 'राज' को वे अधिकतम खतरे के समय देख चुके हैं, उसकी पुनर्स्थापना के कार्य में उन्होंने बहुत योग दिया है, और उन्हें तो इस बात का भी पूरा विश्वास है कि उनका योग ही वह निर्णायक चीज थी जिसने ब्रिटिश राज्य को बचा लिया है। तब फिर इससे अधिक स्वाभाविक और क्या हो सकता है यदि वे यह सोचें कि ब्रिटिश राज्य की जगह अब सिख राज्य की स्थापना कर दी जानी चाहिए, दिल्ली या कलकत्ते की गद्दी पर भारत का शासन करने के लिए किसी सिख सम्राट का अभिषेक कर दिया जाना चाहिए? संभव है कि यह विचार अभी तक सिखों के अंदर बहुत परिपक्व न हुआ हो, यह भी संभव है कि उन्हें होशियारी से इस तरह अलग-अलग वितरित कर दिया जाए कि हर जगह उनका मुकाबला करने के लिए काफी यूरोपियन मौजूद रहें जिससे कि कहीं भी विद्रोह होने पर उन्हें आसानी से दबा दिया जा सके। लेकिन यह विचार अब उनके अंदर आ गया है, यह चीज, हमारे, खयाल के मुताबिक, हर उस व्यक्ति को स्पष्ट होगी जिसने पढ़ा है कि दिल्ली और लखनऊ के बाद से सिखों के क्या रंग-ढंग हैं।
लेकिन, फिलहाल, भारत को अंगरेजों ने फिर जीत लिया है। वह महान विद्रोह जिसकी चिनगारी बंगाल की सेना की बंगावत से उठी थी, लगता है, सचमुच ही खतम हो रहा है। लेकिन इस दोबारा विजय से इंगलैंड भारतीय जनता के मन पर अपना प्रभाव नहीं बैठा सका है। देशियों द्वारा किए जाने वाले अनाचारों-अत्याचारों की बढ़ी-चढ़ी और झूठी रिपोर्टों से क्रुध्द होकर अंगरेजी फौजों ने बदले की कार्रवाई के तहत जो बर्बर और जघन्य कार्य किए हैं, उनकी क्रूरता ने और अवध के राज्य को पूरे तौर से और टुकड़े-टुकड़े करके, दोनों तरफ से, हड़प लेने की उनकी कोशिशों ने विजेताओं के लिए कोई खास प्रेम की भावना नहीं पैदा की है। इसके विपरीत, अंगरेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि हिंदुओं और मुमलमानों दोनों के अंदर ईसाई आक्रमणकारी के विरुध्द पुश्तैनी घृणा की भावना आज हमेशा से ही अधिक तीव्र है। यह घृणा इस समय भले ही दुर्बल हो, लेकिन जब तक सिखों के पंजाब के सिर पर भयानक बादल मंडरा रहा है, तब तक उसे महत्वहीन और निरर्थक नहीं कहा जा सकता। बात इतनी ही नहीं है। दोनों महान एशियाई ताकतें इंगलैंड और रूसइस समय साइबेरिया और भारत के बीच एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गई हैं जहां रूसियों और अंगरेजों के स्वार्थों में सीधी टक्कर होना अनिवार्य है। वह बिंदु पीकिंग है। वहां से पश्चिम की और पूरे एशियाई महाद्वीप पर, एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक ऐसी रेखा जल्द ही खींच दी जाएगी जिस पर इन दो विरोधी स्वार्थों के बीच निरंतर संघर्ष होता रहेगा। इस प्रकार, वास्तव में संभव है कि वह समय बहुत दूर न हो जब व्यास नदी के मैदानों में अगेरजी फौज और कज्जाक का मुकाबला हो जाए। और अगर यह मुकाबला होना है, तो 1,50,000 देशी भारतीयों की उत्कट ब्रिटिश-विरोधी भावनाएं गंभीर चिंता का विषय बन जाएंगी
(1 अक्टूबर 1858 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 1443, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।) - नया जमाना

फ्रेडरिक एंगेल्स की नजरों में 1857 का दिल्ली दखल


उस सम्मिलित शोरगुल में हम नहीं शामिल होंगे जिसके द्वारा उन सैनिकों की बहादुरी की तारीफ में, जिन्होंने हमला करके दिल्ली पर कब्जा कर लिया है, इस समय ब्रिटेन में जमीन-आसमान एक किया जा रहा है। आत्म-प्रशंसा के मामले में अंगरेजों का मुकाबला कोई भी कौम नहीं कर सकतीयहां तक कि फ्रांसीसी कौम भी नहीं, खास तौर से जब सवाल बहादुरी का हो। लेकिन सौ में से निन्यान्वे बार, तथ्यों का विश्लेषण होते ही, उनके शौर्य की समस्त वैभवपूर्ण कहानी एक अत्यंत साधारण घटना रह जाती है। हर समझदार व्यक्ति को उस ढंग से नफरत होगी जिससे ये अंगरेज बुजुर्गजो आराम से अपने घरों में रहते हैं और ऐसी हर चीज से पल्ला छुड़ाकर जोरों से दूर भागते हैं जिसमें सैनिक गौरव प्राप्त करने की दूर की भी संभावना होदूसरों के शौर्य का व्यापार करते हैं। वे यह दिखलाने की कोशिश कर रहे हैं कि दिल्ली के आक्रमण के समय जो पराक्रम दिखलाया गया था, उसमें उनका भी हाथ था। दिल्ली में जो पराक्रम दिखलाया गया, वह बड़ा जरूर थालेकिन किसी भी रूप में असाधारण नहीं था।
दिल्ली की तुलना अगर हम सेवास्तोपोल के साथ करें तो निस्संदेह हम सहमत होंगे कि हिंदुस्तानी सिपाही रूसियों की तरह नहीं थे; ब्रिटिश छावनी के खिलाफ उनका एक भी हमला इंकरमैन के हमलों की तरह का नहीं था; दिल्ली में टोटलेबेन जैसा कोई नहीं था; और, हिंदुस्तानी सिपाही जो व्यक्तिगत और कंपनी दोनों ही दृष्टि से अधिकतर मामलों में बहादुरी से लड़े थेएकदम नेतृत्वविहीन थे। न केवल उनके ब्रिगेडों और डिवीजनों का, बल्कि उनके बटैलियनों तक का कोई नेतृत्व नहीं था; इसलिए उनकी एकता कंपनियों की संगठित शक्ति से आगे नहीं जाती थी। उनमें उस वैज्ञानिक तत्व का एकदम अभाव था जिसके बिना कोई भी फौज आजकल असहाय होती है और किसी शहर की रक्षा का काम
सर्वथा निराशापूर्ण कार्य बन जाता है। फिर भी, संख्या और लड़ाई के उनके साधनों में जो अंतर था, जलवायु का मुकाबला करने की यूरोपियनों की अपेक्षा देशी सिपाहियों में जो अधिक क्षमता थी, दिल्ली के सामने पड़ी (अंगरेजी) फौजें कभी-कभी जिस अत्यंत कमजोर स्थिति में पहुंच जाती थींइस सबकी वजह से दोनों घेरों का, सेवास्तोपोल और दिल्ली के घेरों का, बहुत सा अंतर मिट जाता है और उनकी तुलना करना संभव हो जाता है। (इन कार्रवाइयों को घेरे कहना कैसा विचित्र लगता है!) हमला करके दिल्ली पर कब्जा करने के काम को हम असाधारण, अथवा अनोखे पराक्रम का काम नहीं मानतेयद्यपि यह सही है कि हर लड़ाई की भांति यहां भी व्यक्तिगत पराक्रम के कार्य निस्सदेह दोनों ही तरफ देखने को मिले थे। लेकिन इस बात को हम मानते हैं कि अंगरेजी फौजों की सेवास्तोपोल और बलकलावा के दरम्यान की अग्नि-परीक्षा की तुलना में, दिल्ली के सामने की एंग्लो-इंडियन फौजों ने कहीं अधिक लगन, चारित्रिक शक्ति, विवेक और कौशल का परिचय दिया है। इंकरमैन की घटना के बाद, रूस गई हुई अंगरेजी सेनाएं जहाजों पर बैठकर वापस लौटने के लिए तैयार और राजी थीं और बीच में अगर फ्रांसीसी न आ गए होते, तो निस्संदेह वे लौट आई होतीं। लेकिन, भारत में मौसम, उससे उत्पन्न होने वाली भयानक बीमारियां, संचार के साधनों की गड़बड़ियां, कहीं से जल्दी सैनिक सहायता आने की तमाम संभावनाओं का अभाव, संपूर्ण उत्तर भारत की हालतये सारी चीजें उनसे कहती थीं कि 'वापस चले जाओ!' और अंगरेजी फौजों ने इस कदम की उपादेयता पर विचार तो किया; लेकिन, इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद, अपने मोर्चे पर वे डटी रहीं।
विप्लव जब अपने शिखर पर था, तब सबसे पहले जिस चीज की जरूरत थी, वह यह थी कि उत्तर भारत में एक द्रुतगामी सेना हो। केवल दो ही फौजें थीं, जिनका इस तरह से इस्तेमाल किया जा सकता था : हैवलॉक की छोटी सी फौज, जो जल्दी ही नाकाफी साबित हो गई थी, और वह फौज जो दिल्ली के सामने पड़ी हुई थी। ऐसी हालात में यह निर्विवाद है कि दिल्ली के सामने पड़े रहना और एक अभेद्य शत्रु के साथ व्यर्थ की लड़ाइयां करके अपनी शक्ति गंवाना एक सैनिक गलती थी। एक जगह निठल्ले पड़े रहने की जगह अगर वह फौज चलती-फिरती रहती, तो वह चार गुना अधिक उपयोगी होती। अगर वह गतिशील रहती तो दिल्ली को छोड़कर, उत्तर भारत को साफ कर लिया जा सकता था, और संचार मार्गों की फिर स्थापना हो जाती। अपनी शक्तियों को एक जगह इकट्ठा करने की विद्रोहियों की प्रत्येक कोशिश को असफल बना दिया गया होता, और, इस सबकी वजह से, एक स्वाभाविक और सरल परिणाम के रूप में, फिर दिल्ली का भी पतन हो जाता। यह सब निर्विवाद है। लेकिन राजनीतिक कारणों की मांग थी कि दिल्ली के सामने जो फौजी पड़ाव डाला गया था उसे न उठाया जाए। दोष हेडक्वार्टर (सदर दफ्तर) के उन लालबुझक्कड़ों को दिया जाना चाहिए, जिन्होंने फौज को दिल्ली भेजा था, न कि सेना की उस दृढ़ता को जो एक बार वहां पहुंच जाने के बाद उसने दिखलाई थी। साथ ही साथ, हमें यह बताना भी
नहीं भूलना चाहिए कि वर्षा ऋतु का इस फौज पर जितना असर पड़ने की आशंका थी, उससे कहीं कम असर उस पर पड़ा था। ऐसे मौसम में, सक्रिय सैनिक कार्रवाइयों के परिणामस्वरूप, आम तौर से जैसी बीमारियां फैलती हैं, अगर उनके आसपास की मात्रा में भी वहां वे फैली होतीं तो उस फौज का वापस हट आना, अथवा एकदम भंग हो जाना अपरिहार्य बन जाता। फौज की यह खतरनाक स्थिति अगस्त के अंत तक चलती रही थी। फिर इधर सैनिक सहायता आने लगी, और उधर विद्रोहियों के शिविर के आपसी झगड़े उन्हें कमजोर करते रहे। सितंबर के आरंभ में घेरे वाली गाड़ी आ गई और सुरक्षात्मक स्थिति आक्रमण की स्थिति में बदल गई। 7 सितंबर को पहली बैटरी (तोपखाने) ने गोलाबारी शुरू की और 13 तारीख की शाम को, काम में आने लायक दो दरारें (परकोटे में) पैदा हो गईं। अब हम देखें कि इस दरम्यान क्या हुआ था।
इस संबंध में अगर हम जनरल विल्सन द्वारा भेजी गई सरकारी रिपोर्ट पर भरोसा करेंगे, तो सचमुच भारी गलती के शिकार हो जाएंगे। यह रिपोर्ट लगभग उसी तरह से भ्रामक है जिस तरह क्रीमिया के अंगरेजों के सदर दफ्तर से जारी की जाने वाली दस्तावेजें सदा ही भ्रामक हुआ करती थीं। उस रिपोर्ट से कोई भी इनसान यह नहीं जान सकता कि वे दोनों दरारें कहां हैं, न कोई यही जान सकता है कि हमला करने वाली सेनाओं की क्या सापेक्ष स्थिति है और (मोर्चे पर) वे किस क्रम से लगाई गई हैं। जहां तक लोगों की निजी रिपोर्टों की बात है, तो निस्संदेह वे और भी अधिक भ्रामक हैं। लेकिन, सौभाग्य से, इंजीनियरों और तोपखाने की बंगाल टुकड़ी के एक सदस्य ने जो कुछ हुआ था, उसकी एक रिपोर्ट बंबई गजट में दी है। यह रिपोर्ट उतनी ही स्पष्ट और कामकाजी है जितनी वह सीधी-सादी और अहंकाररहित है। यह अफसर भी उन कुशल वैज्ञानिक अधिकारियों में से एक है जिन्हें सफलता का प्राय: संपूर्ण श्रेय दिया जाना चाहिए। क्रीमिया के पूरे युध्दकाल में एक भी ऐसा अंगरेज अफसर नहीं मिल सका था जो इतनी समझदारी की रिपोर्ट लिख सकता जितनी यह है। दुर्भाग्य से यह अफसर हमले के पहले ही दिन घायल हो गया और फिर उसका पत्र वहीं खतम हो गया। इसलिए, उसके बाद की घटनाओं के संबंध में हम अब भी बिलकुल अंधकार में हैं।
अंगरेजों ने दिल्ली की सुरक्षा की इतनी मजबूत व्यवस्था कर ली थी कि कोई भी एशियाई सेना घेरा डालती, तो वे उसका मुकाबला कर लेते। हमारी आधुनिक धारणाओं के अनुसार, दिल्ली को मुश्किल से ही किला कहा जा सकता है, उसे बस एक ऐसी जगह कहा जा सकता है जो किसी फील्ड सेना (सफरी सेना) के हमले का मुकाबला कर सकती है। उसकी पक्की दीवाल (फसील) 16 फुट ऊंची और 12 फुट चौड़ी है, उससे ऊपर 3 फुट मोटा और 8 फुट ऊंचा कमरकोटा है। कमरकोटे के अलावा, उसकी 6 फुट दीवाल खुली हुई है उसके नीचे ढाल भी नहीं है जिससे उसकी रक्षा हो सके। उस पर सीधे-सीधे गोलाबारी की जा सकती है। इस पक्के प्राचीर के संकरेपन की वजह से उसके बुर्जों और
मारटेलो लाठों (रूड्डह्मह्लद्गद्यद्यश ञ्जश2द्गह्मह्य) के अलावा और कहीं तोपों को रख पाना भी असंभव है। ये बुर्ज और लाठें फसील का बचाव करती थीं, लेकिन बहुत ही कम। इस 3 फुट मोटे पक्के कमरकोटे को घेरा डालने वाली तोपों के जरिए आसानी से तोड़ डाला जा सकता है (फील्ड की तोपों से भी ऐसा किया जा सकता है)। इसलिए बचाव करने वालों की तोपों को, और खास तौर से खाई के पाश्र्वों पर लगी हुई तोपों को खामोश कर देना बहुत आसान था। फसील और खाई के बीच आगे निकला हुआ एक चौड़ा भाग अथवा समतल मार्ग है जिससे एक उपयोगी दरार पैदा करने में सुविधा हो सकती है। इन परिस्थितियों में उसमें फंस जाने वाली किसी सेना के लिए मरघट बनने के बजाए, वह खाई उन सैनिक दस्तों के पुनर्गठित होने के लिए विश्राम-स्थल बन गई थी जो ढलुए किनारे पर चढ़ते समय अस्त-व्यस्त हो जाती थी।
घेरे के नियमों के अनुसार एक ऐसे स्थान पर, जिसके चारों तरफ खंदकें हैं, धावा करना उस वक्त भी पागलपन होता जिस वक्त कि उसकी पहली शर्त, यानी जगह को चारों तरफ से घेरने के लिए पास में आवश्यक फौजें होने की शर्त भी, पूरी हो गई होती। रक्षात्मक तैयारियों की जो स्थिति थी, रक्षकों की जो असंगठित और पस्तहिम्मती से भरी अवस्था थी, उसको देखते हुए हमले का जो तरीका अपनाया गया, उसके अलावा किसी भी दूसरे तरीके का अपनाया जाना एक अक्षम्य अपराध होता। शक्तिपूर्ण हमले के नाम से यह तरीका फौजी लोगों को अच्छी तरह ज्ञात है। रक्षात्मक मोर्चेबंदी जब ऐसी हो कि भारी तोपों के बिना उस पर हमला करना असंभव हो जाए, तब तोपखाने की मदद से उससे तुरत-फुरत निपट लिया जाता है; किले के अंदरूनी भाग पर गोलाबारी निरंतर जारी रखी जाती है, और ज्योंही दरारें इस लायक हो जाती हैं कि उनका इस्तेमाल किया जा सके, त्योंही हमले के लिए फौजें आगे बढ़ जाती हैं।
जिस मोर्चे पर हमला किया जा रहा था, वह उत्तर की तरफ था, यानी अंगरेजों के शिविर के एकदम सामने था। इस मोर्चे पर दो कोटे और तीन बुर्ज हैं। मध्य के (कश्मीरी गेट के) बुर्ज से वे थोड़े तिरछे कोण पर पड़ते हैं। उसका पूर्वी भाग, कश्मीरी गेट के बुर्ज से पानी के बुर्ज तक का भाग, अपेक्षाकृत छोटा है, और, कश्मीरी गेट और मोरी गेट के बुर्जों के बीच, पश्चिमी भाग के सामने, थोड़ा सा आगे बढ़ा हुआ है। कश्मीरी गेट के बुर्ज और पानी के बुर्ज के सामने का मैदान हलके जंगल, बाग-बगीचों, मकानों, आदि से घिरा हुआ है। सिपाहियों ने इसे साफ नहीं किया था। इस कारण हमलावरों को उससे मदद मिलती थी। (इसी चीज से इस बात का जवाब मिल जाता है कि वहां की तोपों के बिलकुल सामने भी अंगरेज अकसर देशी सिपाहियों का पीछा करते हुए कैसे उतनी दूर चले जाते थे। उस समय इस कार्य को बहुत बहादुरी का समझा जाता था, लेकिन, वास्तव में, जब तक उनको यह आड़ प्राप्त थी, तब तक इस तरह पीछा करने में मुश्किल से ही कोई खतरा था।) इसके अलावा, इस मोर्चे से लगभग 400 या 500 गज की दूरी पर, फसील के ही
आमने-सामने एक गहरा नाला था। सामने से हमला करने में इससे स्वाभाविक रूप से सहायता मिलती थी। नदी से अंगरेजों के बाएं बाजू को जबरदस्त सहारा तो मिलता ही था, लेकिन, इसके अतिरिक्त, कश्मीरी गेट और पानी के बुर्जों के बीच के हलके से उस उभार का आक्रमण के मुख्य लक्ष्य के रूप में चुनाव किया जाना भी बहुत सही था। साथ ही साथ, पश्चिम की फसील और बुर्जों के ऊपर एक बनावटी हमला भी किया गया। यह चाल इतनी कामयाब रही कि सिपाहियों की मुख्य शक्ति उसी दिशा में लग गई। काबुली गेट के बाहर के उपनगरों में, अंगरेजों के दाहिने पार्श्व पर हमला करने के लिए उन्होंने मजबूत सेना इकट्ठी कर ली। मोरी गेट और कश्मीरी गेट के बुर्जों के बीच की पश्चिम वाली फसील को अगर सबसे ज्यादा खतरा होता तब तो यह दाव एकदम सही और अत्यधिक कारगर हुआ होता। सक्रिय सुरक्षा के एक साधन के रूप में बाजू से घेरने वाली सिपाहियों की यह चाल बहुत बढ़िया रही होती; वैसी हालत में, आगे बढ़कर, हमला करने वाली प्रत्येक सैनिक टुकड़ी को पहले से ही यह सेना बाजू से दबा लेती। लेकिन, इस मोर्चे की पहुंच पूर्व की ओर कश्मीरी गेट और पानी के बुर्जों के दरम्यान की फसील तक नहीं हो सकी; और, इस तरह, उस पर कब्जा होने से रक्षा करने वाली फौजों का सबसे अच्छा भाग रणक्षेत्र के निर्णायक स्थान से दूर हट गया।
तोपों को लगाने के अड्डों के चुनाव, उनके निर्माण और हथियारों से उनको लैस करने का काम जिस तरह से किया गया था, और जिस तरह से उनका इस्तेमाल किया गया था, उसकी अधिक से अधिक प्रशंसा की जानी चाहिए। अंगरेजों के पास लगभग 50 तोपें और मॉर्टर थे जो अच्छी ठोस रक्षात्मक दीवालों के पीछे शक्तिशाली बैटरियों के साथ केंद्रित थे। सरकारी बयानों के अनुसार, जिस मोर्चे पर हमला किया जा रहा था, उस पर सिपाहियों के पास 55 तोपें थीं, लेकिन वे छोटे-छोटे बुर्जों और माटर्ेलों लाठों पर इधर-उधर बिखरी हुई थीं। वे मिलकर केंद्रित रूप से काम नहीं कर सकती थीं, और तीन फुट का जो रद्दी सा कमरकोटा था, उससे उनका मुश्किल से ही कोई बचाव होता था। इसमें कोई शक नहीं कि रक्षा करने वालों की तोपों को खामोश करने के लिए कुछ ही घंटे काफी हुए होंगे और उसके बाद करने के लिए फिर बहुत ही कम रह गया था।
8 तारीख को, फसील से 700 गज की दूरी से, बैटरी (तोपखाना) नं. 1 की 10 तोपों ने गोलाबारी शुरू की। जब रात आई, तो जिस नाले का पहले जिक्र किया गया है, उसे एक प्रकार की खंदक में बदल दिया गया। 9 तारीख को, बिना किसी प्रतिरोध के, इस नाले के सामने के टूटे-फूटे मैदान और मकानों पर कब्जा कर लिया गया; और 10 तारीख को बैटरी नं.2 की 8 तोपों के मुंह खोल दिए गए। यह बैटरी फसील से 500 या 600 गज के फासले पर थी। 11 तारीख को बैटरी नं. 3 नेजिसे किसी टूटी हुई जगह में, पानी के बुर्ज से 200 गज की दूरी पर, बहुत हिम्मत और होशियारी के साथ खड़ा किया गया थाअपनी 6 तोपों से गोले बरसाने शुरू किए और 10 भारी मॉर्टरों ने शहर पर गोलाबारी आरंभ कर दी।
13 तारीख की शाम को रिपोर्ट मिली कि दरारें पैदा हो गई हैंएक कश्मीरी बुर्ज के दाहिने बाजू की फसील में और दूसरी, पानी के बुर्ज के बाएं बाजू में, सामने की तरफ। सीढ़ियां लगा कर इन दरारों से ऊपर चढ़ा जा सकता है। फौरन हमले का हुक्म दे दिया गया। 11 तारीख को संकटग्रस्त दोनों बुर्जों के बीच के ढाल पर सिपाहियों ने जवाबी हमला करने की कोशिश की और, अंगरेजों की बैटरियों के सामने ही, लगभग 350 गज पर, लड़ाई के लिए एक खंदक तैयार कर ली गई। इसी अड्डे से, काबुली गेट के बाहर, बाजुओं से आक्रमण के लिए भी वे आगे बढ़े। लेकिन सक्रिय रक्षा के ये प्रयत्न बिना किसी एकता, योजना या उत्साह के किए गए थे। उनका कोई फल नहीं निकला।
14 तारीख की सुबह अंगरेजों की 5 सैनिक टुकड़ियां हमले के लिए आगे बढ़ीं। एक, दाहिनी तरफ, काबुली गेट के अड्डे पर कब्जा करने के लिए और,इसमें सफलता मिलने पर, लाहौरी गेट पर हमला करने के लिए। शेष एक-एक टुकड़ी हर दरार की तरफ गई, एक कश्मीरी गेट की तरफ बढ़ी जिसको उसे उड़ा देना था, और एक बतौर रिजर्व काम करने के लिए गई। पहली को छोड़ कर, ये सारी सैनिक टुकडियां सफल हुईं। दरारों की तो नाममात्र के लिए ही रक्षा की जा रहा थी, लेकिन फसील के पास के मकानों से किया जाने वाला प्रतिरोध बहुत जबरदस्त था। इंजीनियरों की टुकड़ी के एक अफसर और तीन साजर्ेंटों की बहादुरी के कारण (क्योंकि यहां वास्तव में बहादुरी दिखाई गई थी) कश्मीरी गेट को सफलतापूर्वक खोल दिया गया और, इस तरह यह सैनिक टुकड़ी भी अंदर घुसने में समर्थ हुई। शाम तक पूरा उत्तरी मोर्चा अंगरेजों के कब्जे में आ गया था। लेकिन जनरल विल्सन यहीं पर रुक गए। जो धुआंधार हमला किया जा रहा था, उसे बंद कर दिया गया, तोपों को आगे लाया गया और शहर के हर मजबूत मुकाम के खिलाफ उन्हें लगा दिया गया। शस्त्रागार पर हमला करके कब्जा करने की बात छोड़ दी जाए तो वास्तव में बहुत ही कम लड़ाई हुई मालूम होती है। विद्रोहियों की हिम्मत पस्त हो गई थी और वे भारी संख्या में शहर छोड़ कर चले गए। विल्सन शहर में सावधानी से घुसे, 17 तारीख के बाद उन्हें मुश्किल से ही किसी से लड़ना पड़ा। 20 तारीख को उस पर उन्होंने पूरा कब्जा कर लिया।
आक्रमण के संचालन के संबंध में हमारी राय जाहिर की जा चुकी है। जहां तक बचाव का सवाल है, तो जवाबी हमले करने की कोशिशों, काबुली गेट के पास बाजू से घेरने के प्रयत्न, जवाबी घातें, राइफल चलाने की खंदकें,ये सब चीजें बतलाती हैं कि युध्द संचालन की कुछ वैज्ञानिक धारणाएं सिपाहियों के अंदर भी प्रवेश कर गई थीं; लेकिन उन पर किसी प्रभावशाली ढंग से अमल न किया जा सका, क्योंकि या तो सिपाहियों को वे पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं थीं, अथवा उन पर अमल करने लायक काफी शक्ति वे नहीं रखते थे। इन वैज्ञानिक धारणाओं की कल्पना स्वयं भारतीयों ने की थी, अथवा उन कुछ यूरोपियनों ने जो उनके साथ हैंइस बात का निर्णय करना निस्संदेह कठिन है। लेकिन एक चीज निश्चित है : ये कोशिशें, यद्यपि उन पर अमल ठिकाने से नहीं किया गया था, अपनी योजना
और तैयारी में सेवास्तोपोल की सक्रिया सुरक्षा की योजना और तैयारी से बहुत मिलती-जुलती हैं, और जिस तरह से उनको कार्यान्वित किया गया था, उससे मालूम होता है मानो किसी यूरोपियन अफसर ने सिपाहियों के लिए एक सही योजना तैयार कर दी थी, लेकिन सिपाही या तो उसे अच्छी तरह समझ नहीं पाए, या फिर संगठन और नेतृत्व के अभाव के कारण ये अमली योजनाएं उनके हाथों में महज कमजोर और बेजान कोशिशें बन कर रह गईं।
(5 दिसंबर 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5188, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)

1857 में लखनऊ पर हमले का पूरा वृत्तान्त- फ्रेडरिक एंगेल्स


                        आखिरकार लखनऊ पर किए गए हमले और उसके पतन का ब्योरेवार वृत्तांत अब हमें प्राप्त हो गया है। सैनिक दृष्टि से सूचना का मुख्य स्रोत जो चीज हो सकती थी, यानी सर कॉलिन कैंपबेल की रिपोर्ट, वह तो वास्तव में अभी तक प्रकाशित नहीं की गई है; लेकिन ब्रिटेन के अखबारों में छपे हुए संवाद, और खास तौर से, लंदन टाइम्स में प्रकाशित हुए मिस्टर रसेल के पत्र जिनके मुख्य अंश हमारे पाठकों के सामने रखे जा चुके हैं। हमलावर दल की कार्रवाइयों की आम स्थिति को बताने के लिए बिलकुल काफी हैं।
तार से प्राप्त हुए समाचारों के आधार पर रक्षात्मक कार्रवाइयों में दिखलाई गई कायरता के संबंध में जो निष्कर्ष हमने निकाले थे, उन्हें विस्तृत रिपोर्टों ने एकदम सही साबित कर दिया है। हिंदुओं ने जो किलेबंदी की थी, वह देखने में भयानक लगने पर भी, वास्तव में उन आग्नेय पंखदार ब्यालों और विकृत चेहरों की आकृतियों से अधिक महत्व की नहीं थी जो चीनी 'योध्दा' अपनी ढालों पर अथवा अपने शहरों की दीवालों पर बना देते हैं। ऊपर से देखने पर प्रत्येक किला एक अभेद्य दीवार मालूम होता था। गोलीबारी के लिए बनाए गए गुप्त छेदों और मार्गों और कमरकोटों के अलावा और कुछ उसमें नहीं दिखलाई देता था। उसके पास पहुंचने के मार्ग में हर संभव प्रकार की कठिनाई दृष्टिगत होती थी। हर जगह उनमें तोपें और छोटे हथियार अड़े हुए दिखलाई देते थे। लेकिन हर ऐसे किलेबंद मोर्चे के बाजुओं और पिछवाड़े को पूर्णतया उपेक्षित छोड़ दिया गया था; विभिन्न किलेबंदियों के बीच पारस्परिक सहयोग की बात तो जैसे कभी सोची ही नहीं गई थी; और, किलेबंदियों के बीच की और उनके आगे की जमीन तक को कभी साफ नहीं किया गया था। इससे रक्षा करने वालों की जानकारी के बिना ही, सामने से और बाजुओं से, दोनों तरफ से, उन पर हमले की तैयारियां की जा सकती थीं और नितांत निरापद रूप से कमरकोटे के कुछ गज पास तक पहुंचा जा सकता था। सुरंग लगाने वाले ऐसे निजी सिपाहियों के एक समूह से, जिसके कोई अफसर नहीं रह गए थे और जो ऐसी सेना में काम कर रहे थे जिसमें अज्ञान और अनुशासनहीनता का ही बोलबाला था, जिस प्रकार की किलेबंदियों की अपेक्षा की जा सकती थी, ये उसी प्रकार की किलेबंदियां थीं। लखनऊ की किलेबंदियां क्या थीं, बस देशी सिपाहियों के लड़ने का जो पूरा तरीका है उसी को जैसे पक्की ईंटों की दीवालों और मिट्टी के कमरकोटों का रूप दे दिया गया था। यूरोपियन सेनाओं की कार्य-नीति का जो यांत्रिक या ऊपरी भाग था, उसे तो आंशिक रूप से उन्होंने जान लिया था; कवायद के नियमों और प्लैटून की ड्रिल के तरीकों की उन्हें काफी जानकारी हो गई थी; तोपें लगाकर बैट्री का निर्माण वे कर ले सकते थे और दीवाल में गुप्त रास्ते भी बना सकते थे; लेकिन किसी मोर्चे की रक्षा के लिए कंपनियों और बटैलियनों की गतिविधियों को किस तरह से संयोजित किया जाए, अथवा बैट्रियों और गुप्त मार्गों वाले मकानों और दीवालों को किस तरह एक सूत्र में ऐसे पिरोया जाए कि उनसे मुकाबला कर सकने लायक कैंप कायम हो जाएइसके बारे में वे कुछ भी नहीं जानते थे। इस प्रकार, आवश्यकता से अधिक छेद बनाकर अपने महलों की ठोस पक्की दीवालों को उन्होंने कमजोर कर दिया था; उनमें गुप्त मार्गों और रंध्रों (छेदों) की तहों पर तहें उन्होंने बना दी थीं; उनकी छतों पर चबूतरे बनाकर उन्होंने बैट्रियां लगा दी थीं; लेकिन यह सब बेकार था, क्योंकि उन्हें बहुत आसानी से उनके खिलाफ ही इस्तेमाल किया जा सकता था। इसी तरह से, यह जानते हुए कि सैनिक कार्यनीति में वे कच्चे हैं, अपनी इस कमी को पूरा करने की कोशिश में हर चौकी पर उन्होंने अधिक से अधिक आदमी ठूंस दिए थे। इसका नतीजा सिवा इसके और कुछ हो नहीं सकता था कि उससे अंगरेजों की तोपों को भयानक सफलता प्राप्त हो जाए; और, ठलुओं की इस भीड़ पर किसी अप्रत्याशित दिशा से आक्रमणकारी सेनाएं ज्योंही धावा बोल दें, त्योंही किसी भी तरह का अनुशासित और व्यवस्थित रक्षात्मक कार्य वहां असंभव हो जाए। और जब किसी आकस्मिक योग से किलेबंदियों के भयानक दिखने वाले इस मोर्चे पर हमला करने के लिए अंगरेज मजबूर हो गए, तो यह देखा गया कि इन किलेबंदियों का निर्माण इतना दोषपूर्ण था कि बिना किसी जोखिम के ही उनके पास पहुंचा जा सकता था, उन्हें तोड़ा जा सकता था और उन पर अधिकार किया जा सकता था। इमामबाड़े में ऐसा ही देखने को मिला था। इस इमारत से कुछ ही गजों के फासले पर एक पक्की दीवाल थी। अंगरेजों ने इस दीवाल के बिलकुल पास तक एक छोटी सी सुरंग बना ली (यह इस बात का सबूत है कि इमारत के ऊपरी हिस्से में तोपों के लिए जो झरोखे और रंध्र बनाए गए थे, उनसे एकदम सामने के मैदान पर गोलंदाजी नहीं की जा सकती थी)। उसके बाद इसी दीवाल का, जिसे स्वयं हिंदुस्तानियों ने अपने लिए बनाया था, अंगरेजों ने इमारत को तोडने के लिए एक आड़ के रूप में इस्तेमाल किया। इस दीवाल के पीछे वे 68-68 पौंड की दो तोपें (नौ सैनिक तोपें) ले आए। ब्रिटिश सेना में 68 पौंड वाली हल्की से हल्की तोप का वजन भी, उसकी गाड़ी के बिना, 87 हंड्रेडवेट होता है; लेकिन अगर मान लें कि बात 8 इंच वाली तोप की ही की जा रही है, तो इस तरह की हल्की से हल्की तोप का वजन भी 50 हंड्रेडवेट होता है, और गाड़ी समेत कम से कम 3 टन। इस तरह की तोपें एक ऐसे महल के नजदीक तक ले आई जा सकीं जो कई मंजिल ऊंचा है और जिसकी छत पर तोपखाना लगा हुआ है, यह बात जाहिर करती है कि रक्षा करने वाले सिपाही सैनिक इंजीनियरिंग के संबंध में जिस प्रकार अनभिज्ञ थे और सैनिक महत्व की जगहों के संबंध में जिस प्रकार का तिरस्कार भाव उनमें भरा हुआ था, उस तरह की चीज किसी भी सभ्य सेना के किसी भी सुरंग लगाने वाले सैनिकों में नहीं मिल सकती।
अब रही उस विज्ञान की बात जिसका वहां अंगरेजों को मुकाबला करना पड़ा था। जहां तक साहस और संकल्प की बात है, तो रक्षकों के अंदर इनका भी उतना ही अभाव था। ज्योंही एक सेना ने हमला किया, त्योंही मार्टीनियर से लेकर मूसाबाग तक देशियों का बस एक ही शानदार नजारा दिखलाई दियावे सब के सब सिर पर पैर रखकर भागते नजर आए! इन तमाम लड़ाइयों में एक भी ऐसी नहीं है जिसका उस कत्लेआम से भी (क्योंकि लड़ाई तो उसे मुश्किल से ही कहा जा सकता है) मुकाबला किया जा सके जो सिकंदरबाग में कैंपबेल द्वारा रेजीडेंसी की मदद के समय हुआ था। हमलावर सेनाएं ज्योंही आगे बढ़ती हैं, त्योंही पीछे की तरफ आम भगदड़ मच जाती है, और वहां से भागने के चूंकि कुछ इने-गिने ही संकरे रास्ते हैं, इसलिए यह सारी बेतहाशा भागती भीड़ वहीं ठहर जाती है। एकदम भेड़ियाधसान ढंग से लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरते-पड़ते नजर आते हैं और जरा भी प्रतिरोध किए बिना बढ़ते हुए अंगरेजों की गोलियों और संगीनों के शिकार बन जाते हैं। घबराए हुए देशियों के ऊपर किए जाने वाले इन खूली हमलों में से किसी भी एक में 'अंगरेजों की संगीन' ने जितने लोगों की जानें ली हैं, उतने लोगों की जानें यूरोप और अमरीका दोनों में अंगरेजों द्वारा लड़ी गई सारी लड़ाइयों में मिलाकर भी उसने नहीं ली थीं। पूरब की लडाइयों में जहां एक ही पक्ष सक्रिय होता है और दूसरा बिलकुल बोदे ढंग से निष्क्रिय, इस तरह के संगीन युध्द एक आम बात है; बर्मी नोकदार बल्लियों से बने मोर्चे प्रत्येक जगह इसी चीज का उदाहरण पेश करते हैं। मिस्टर रसेल के वृत्तांत के अनुसार, अंगरेजों की मुख्य क्षति जो हुई थी, वह उन्हें उन हिंदुस्तानियों से पहुंची थी जो भागते समय पीछे छूट गए थे और जिन्होंने बैरीकेड बनाकर महलों के कमरों में अपने को बंद कर लिया था। वहां से खिड़कियों के अंदर से आंगन और बाग में रहने वाले अफसरों के ऊपर उन्होंने गोलियां बरसाई थीं।
इमामबाड़े और कैसरबाग के हमले के समय हिंदुस्तानी इतनी तेजी से भागे थे कि उन जगहों पर कब्जा करने तक की जरूरत नहीं पड़ी थी। उनके अंदर अंगरेज यों ही चलते हुए पहुंच गए थे। लेकिन वास्तव में दिलचस्प चीज अब शुरू हो रही थी; क्योंकि, जैसा कि मिस्टर रसेल उल्लसित होकर कहते हैं, कैसरबाग की फतह उस दिन इतनी अप्रत्याशित थी कि इस बात तक के लिए काफी समय नहीं मिल पाया था कि अंधाधुंध लूट-खसोट को रोकने की कोई तैयारी की जा सके। अपने अंगरेज सिपाहियों को अवध के महामहिम के हीरे-जवाहरात, बहुमूल्य हथियारों, कपड़ों और उनकी तमाम पोशाकों तक को इस तरह खुल कर लूटते-खसोटते देखकर सच्चे, उद्दंडता-प्रेमी जॉन बुल को एक खास आनंद मिला होगा! सिख, गोरखे और उनके तमाम नौकर-चाकर भी अंगरेजों के इस उदाहरण की नकल करने के लिए बिलकुल तैयार थे। इसके बाद फिर लूट और तबाही का ऐसा नजारा वहां दिखलाई दिया कि उसका बयान करने की ताकत मि. रसेल की लेखनी में भी नहीं रह गई। हर कदम के साथ अब लूट-खसोट और तबाही का बाजार गर्म था। कैसरबाग का पतन 14 तारीख को हो गया था; और, उसके आधे घंटे के बाद ही अनुशासन समाप्त हो गया था। सैनिकों के ऊपर से अफसरों का सारा नियंत्रण खतम हो गया था। 17 तारीख को लूट-खसोट की रोकथाम के लिए जनरल कैंपबेल को जगह-जगह पहरा बैठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। 'जब तक मौजूदा उच्छृंखलता का दौर खतम न हो जाए,' तब तक हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने के लिए वह बाध्य हो गए। सैनिक साफ तौर से हाथ से बिलकुल बाहर निकल गए थे। 18 तारीख को हमें यह कहा जाता है कि बहुत ही निम्न किस्म की लूट-खसोट तो रुक गई है, लेकिन तबाही और बर्बादी का सिलसिला अब भी उसी तरह जारी है। लेकिन जिस समय शहर में सेना का अगला भाग, मकानों के अंदर से किए जाने वाले देशियों की गोलीबारी का मुकाबला कर रहा था, उसी समय उसका पिछला भाग खूब जी खोलकर लूट-खसोट और बर्बादी कर रहा था। शाम को लूट-खसोट के खिलाफ एक नया एलान किया गया। आदेश जारी किया गया कि प्रत्येक रेजीमेंट से छांट-छांट कर मजबूत टुकड़ियों भेजी जाएं जो लूट करने वाले अपने सैनिकों को पकड़ कर वापिस ले आएं। उन्हें यह भी आदेश दिया गया कि अपने अनुचरों को भी वे अपने साथ ही अपने घर पर रखें। जब तक कहीं डयूटी पर न भेजा जाए, तब तक कोई भी व्यक्ति कैंप से बाहर न जाए। 20 तारीख को इसी आदेश को पुन: दुहराया गया। उसी दिन, दो अंगरेज 'अफसर और भद्र प्ररुष,' लेफ्टीनेंट केप और थैकवेल, 'शहर में लूट मचाने गए और वहीं एक घर के अंदर उनकी हत्या कर दी गई। और 26 तारीख को भी हालत इतनी खराब थी कि लूट और बलात्कार को रोकने के लिए अत्यंत कठोर आदेश फिर जारी करने पड़े। हर घंटे हाजिरी लेने की व्यवस्था जारी कर दी गई। तमाम सिपाहियों को शहर के अंदर घुसने की सख्त मनाही कर दी गई। यह हुक्म जारी कर दिया गया कि अनुचर लोग अगर हथियारों के साथ शहर में पाए जाएं, तो उन्हें फांसी दे दी जाए; जिस समय सैनिक डयूटी पर न हों, वे हथियार के साथ बाहर न निकलें, और जिन लोगाें का लड़ाई से ताल्लुक नहीं है, उन सबों से हथियार छीन लिए जाएं। इन आदेशों की गंभीरता स्पष्ट कर देने के लिए 'उचित स्थानों पर' लोगों को बेंत लगाने के लिए काफी टिकटियां खड़ी कर दी गईं।
19वीं शताब्दी में किसी सभ्य सेना का इस तरह का व्यवहार सचमुच अनोखी चीज है। दुनिया की कोई भी दूसरी सेना अगर इस तरह की ज्यादतियों के दसवें हिस्से की भी गुनहगार होती, तो क्रुध्द अंगरेजी अखबार उसको किस तरह से बदनाम करते, इसकी अच्छी तरह कल्पना की जा सकती है। लेकिन ये तो ब्रिटिश सेना के कारनामे हैं, और इसलिए हमसे कहा जाता है कि युध्द में ऐसी चीजों का होना स्वाभाविक होता है। ब्रिटिश अफसरों और भद्र पुरुषों को पूर्ण स्वच्छंदता है कि चांदी के चम्मचों, हीरे-जवाहरात से जड़े कंगनों और अन्य छोटी-मोटी उन तमाम चीजों को, जिन्हें अपने गौरवस्थल पर वे पा जाएं, निशानियों के रूप में हथिया लें। और अगर युध्द के बीचोबीच भी कैंपबेल को इस बात के लिए मजबूर होना पड़ा है कि व्यापक डाकेजनी और हिंसा को रोकने की गरज से, स्वयं अपनी सेना के हथियारों को वह छीन ले, तो हो सकता है कि इस कदम को उठाने के लिए उसके पास कोई फौजी कारण रहे हों। पर, सचमुच ऐसा कौन होगा जो इतनी थकान और मुसीबतों के बाद यदि वे बेचारे हफ्ते भर की छुट्टी मनाएं और कुछ मौज-मजा करें, तो उस पर भी आपत्ति करे!
सच तो यह है कि यूरोप और अमरीका में कहीं भी ऐसी कोई सेना नहीं है जिसमें इतनी पाशविकता भरी हो जितनी कि ब्रिटिश सेना में है। लूट-खसोट, हिंसा, कत्लेआम आदि की वे चीजें, जिन्हें हर जगह सख्ती से और पूर्णतया खतम कर दिया गया है, ब्रिटिश सिपाही का अब भी एक पुरातन अधिकार, उसका एक निहित विशेषाधिकार मानी जाती हैं। स्पेन के युध्द में बाडाजोज और सान सेबास्टिन पर हमला करके अधिकार कर लेने के बाद, ब्रिटिश सैनिकों ने लगातार कई दिनों तक जो कुत्सित कार्य वहां किए थे, उनका फ्रांसीसी क्रांति के आरंभ के बाद से किसी भी दूसरे देश के इतिहास में दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। कब्जा किए गए शहर को लूटने-खसोटने के लिए सिपाहियों को सौंप देने की मध्ययुगीन प्रथा पर और सभी जगहों में प्रतिबंध लगा दिए गए हैं, लेकिन ब्रिटिश सेना में यह नियम अब भी उसी प्रकार चालू है। जरूरी सैनिक आवश्यकताओं की वजह से दिल्ली में इस चीज को रोका गया था; और यद्यपि उसके एवज में ज्यादा तनखाह देकर सेना को खुश करने की कोशिश की गई थी, फिर भी वह काफी बुड़बुड़ाई थी। और अब लखनऊ में दिल्ली की सारी कमी को उसने पूरा कर लिया है। बारह दिन और बारह रात तक लखनऊ में कोई ब्रिटिश सेना नहीं थीबस कानूनहीन, शराब में धुत पाशविकता से भरी हुई केवल एक भीड़ थी। वह डाकुओं के गिरोहों में बंटी हुई थी। और ये डाकू देशी सिपाहियों से कहीं अधिक बेलगाम, हिंस्र और लालची थे जिन्हें वहां से निकाल बाहर किया गया था। 1858 में की गई लखनऊ की लूट-खसोट और बर्बादी ब्रिटिश सेना के माथे पर हमेशा एक अमिट कलंक के रूप में अंकित रहेगी।
भारत को सभ्य और इनसान बनाने की क्रिया में क्रूर ब्रिटिश सैनिकों ने अगर भारतीयों की केवल निजी संपत्ति की ही लूट-मार मचाई थी, तो उसके फौरन बाद ब्रिटिश सरकार स्वयं आगे आ गई और उसने भारतीयों की वास्तविक रियासतों को भी हड़प लिया। लोग बातें करते हैं कि प्रथम फ्रांसीसी क्रांति ने अमीर-उमरा और गिरजाघरों की जमीनें छीन ली थीं। लोग कहते हैं कि लुई नेपोलियन ने ओरलिंयस परिवार की संपत्ति जब्त कर ली थी। पर यहां लार्ड कैनिंग हैंएक ब्रिटिश अमीर, जो अपनी भाषा,आचार-व्यवहार और भावनाओं में मधुर हैं। वे पधारते हैं और अपने एक उच्च अधिकारी, विस्काउंट पामर्सटन की आज्ञा से, एक पूरी कौम की रियासतों को हजम कर जाते हैं। 10,000 वर्ग मील के क्षेत्र में एक-एक धूर, एक-एक कट्ठा और एक-एक एकड़ भूमि पर वे कब्जा कर लेते हैं! जॉन बुल के लिए यह सचमुच बहुत बढ़िया लूट है! और नई सरकार के नाम पर, लार्ड एलेनबरो ज्योंही इस बेमिसाल हरकत को अनुचित ठहराते हैं,त्योंही इस जबरदस्त डाकेजनी की हिमायत करने के लिए और यह दिखाने के लिए कि जॉन बुल को इस बात का पूरा अधिकार है कि वह जिस चीज को चाहें उसे जब्त कर लेंटाइम्स और दूसरे अनेक छोटे-मोटे ब्रिटिश अखबार फौरन उठ खड़े होते हैं! पर हां, जॉन तो एक असाधारण प्राणी है! उसके लिए जो हरकत सद्गुण है, उसी को अगर दूसरा कोई करने की हिमाकत दिखाए, तो टाइम्स की नजर में वह महाघातक बन जाएगा!
इसी बीच, लूट-खसोट के लिए ब्रिटिश सेना के एकदम तितर-बितर हो जाने के कारण, विद्रोही भाग कर खुले मैदानों में दूर निकल गए। उनका पीछा करने वाला कोई नहीं था। वे रुहेलखंड में फिर जमा हो रहे हैं। साथ ही साथ उनका एक छोटा सा भाग अवध की सीमा में छोटी-मोटी लड़ाइयां लड़ रहा है। कूछ दूसरे भगोड़े बुंदेलखंड की तरफ निकल गए हैं। साथ ही गर्मी का मौसम और वर्षा के दिन भी तेजी से समीप आते जा रहे हैं और इस बात की आशा करने का कोई कारण नहीं है कि इस बार भी मौसम यूरोपियनों के लिए, पिछले वर्ष की ही तरह, अप्रत्याशित रूप से उतना ही अनुकूल होगा। पिछले साल, अधिकांश यूरोपियन सैनिक वहां के मौसम के आदी हो गए थे; इस साल उनमें से अधिकांश नए-नए वहां पहुंचे हैं। इसमें संदेह नहीं कि जून, जुलाई और अगस्त में किए जाने वाले सैनिक अभियानों में अंगरेजों को भारी संख्या में लोगों की जाने गंवानी पड़ेंगी, और हर जीते गए शहर में गैरीसनों को तैनात करने की आवश्यकता के कारण, उनकी सक्रिय सेना बहुत जल्दी साफ हो जाएगी। अभी से ही हमें बता दिया गया है कि 1,000 सैनिकों की मासिक सहायता से भी सेना इस स्थिति में नहीं रहेगी कि वह कारगर रह सके। और जहां तक गैरीसनों की बात है, तो केवल लखनऊ के लिए 8,000 सैनिकों की, यानी कैंपबेल की एकतिहाई सेना से भी अधिक की आवश्यकता है। रुहेलखंड के अभियान के लिए जो शक्ति संगठित की जा रही है वह भी लखनऊ के इस गैरीसन की तुलना में मुश्किल से ही बड़ी होगी। विद्रोहियों की बड़ी-बड़ी सेनाओं के इधर-उधर तितर-बितर हो जाने के बाद यह निश्चित है कि छापेमार युध्द शुरू हो जाएगा। हमें यह इत्तिला भी मिल गई है कि ब्रिटिश अफसरों के अंदर यह राय बन रही है कि वर्तमान युध्द और उसके साथ जमकर होने
वाली लड़ाइयों और घेरों की तुलना में, छापेमार युध्द अंगरेजों के लिए कहीं अधिक कष्टदायक और जानलेवा साबित होगा। और, अंत में, सिख भी इस तरह से बात करने लगे हैं जो अंगरेजों के लिए बहुत शुभ नहीं मालूम होती है। वे महसूस करते हैं कि उनकी सहायता के बिना अंगरेज भारत के ऊपर कब्जा नहीं बनाए रख सकते थे, और अगर विद्रोह में वे भी शामिल हो गए होते तो यह निश्चित है कि, कम से कम कुछ समय के लिए, हिंदुस्तान से इंगलैंड हाथ धो बैठता। इस बात को वे जोर-जोर से कह रहे हैं और अपने पूर्वी ढंग से बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे हैं। अंगरेज अब उनकी नजर में उतनी अधिक श्रेष्ठ कौम नहीं रह गई जिसने मुड़की, फीरोजशाह और अलिवाल में उन्हें परास्त कर दिया था। इस तरह के विश्वास के बाद, खुली शत्रुता करने लगना पूर्वी देशों के लिए एक ही कदम दूर रह जाता है। एक चिनगारी से भी आग भड़क सकती है।
संक्षेप में, लखनऊ की फतह भी भारतीय विद्रोह को कुचलने में उसी तरह असफल रही है जिस तरह कि दिल्ली की फतह उसे खतम करने में नाकामयाब रही थी। इस साल गर्मियों के सैनिक अभियान के फलस्वरूप ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जा सकती है जिसके कारण अगले जाड़ों में अंगरेजों को मोटे तौर से फिर वहीं से काम शुरू करना पड़ जाए जहां से उन्होंने पहले शुरू किया था। यह भी संभव है कि पंजाब को भी उन्हें फिर से फतह करना पड़े। लेकिन अनुकूल से अनुकूल परिस्थिति में भी, उन्हें एक लंबे और कष्टदायक छापामार युध्द का सामना करना पड़ेगा। भारत की गर्मी में यूरोपियनों के लिए यह कोई ऐसी अच्छी चीज नहीं है जिससे कोई दूसरा ईर्ष्या कर सके!

(25 मई 1858 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5333, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)
 

साभार : नया जमाना