दिसंबर 24, 2010

घोटालों में रोजगार के अवसर अनन्त !

- रोशन सुचान 
एक अच्छी बात देश में यह हुई है कि लोग अब जान और मान गये हैं कि घोटालों के उन्नत अवसर यहाँ हैं , जिससे घोटालों का नया वातावरण बना है / यदि आप घोटाला करने पर आमदा ही हैं , तो कोई आपको रोकेगा नहीं / बल्कि जितना जैसा सहयोग देते बनेगा , देगा / कुछ नहीं तो आपके पकड़े जाने पर वह आपके पक्ष में ब्यान ही दे देगा कि इरादा बुरा नहीं था / पार्टी के लिए किया था , बच्चों के लिए अस्पताल बनाना था ,बच्चे कि शादी करनी थी , वर्कर्स को बांटना था , झंडे प्रिंट करने थे / यानि कि मामला अर्जेंट का था और घोटाले किए बगैर कोई चारा नहीं था , सो किया / इन बातों से यह हुआ है कि घोटालों के पक्ष में एक हवा सी बनी है / आप अगर घोटाला करना करना चाहते हैं , आइए बैठिए ! आपका स्वागत है / तो कौन सा घोटाला पसंद है आपको ? बैंकों वाला और शेयरों वाला तो आउट आफ डेट हो गया / हवाला भी अब पुराने फैशन में चला गया समझो / जनाब ! घोटालों का अपना तेजी से बदलता फैशन संसार है / आप कुछ नया लाइए / फिर देखिएगा चहुँ ओर लाल कालीनें ही कालीनें बिछी हैं , घोटालातुर चरणों के प्रतीक्षा मेंहमारी मोतिओं वाली कांग्रेस सरकार से ही सीखो / जो बोफोर्स , कॉमोडिटी एक्सचेंज स्कैम और यूरिया खाद के पुराने फैशन के बाद अब कॉमनवेल्थ गेमस , आदर्श सोसाइटी , 1 लाख 75 हजार करोड़ रूपए के 2 -जी स्पैक्ट्रम जैसे नए - नए फैशन के घोटाले लाँच कर रही है / पर सुसरे बी.जे.पी. वालों से यह फील- गुड देखा नहीं जा रहा / ओपोजिशन में हैं ना , बेचारे ! सोच रहे हैं कि ये कांग्रेस वाले तो हमसे भी एक कदम आगे निकल गये हैं / हमने तो महज कुछ हजार करोड़ के ताबूत ही खाए थे , पट्रोल पम्प आवंटन में थोडा सा भेदभाव किया था , कुछ पैसे लेकर बस सवाल ही पूछे थे , टाटा को विदेश संचार निगम कोडियों के भाव बेचा था / एयर इंडिया के संतूर होटल को 90 फीसदी कम कीमत पर बेचकर नयाँ कीर्तिमान बनाया था / पर ये तो 70 - 70 हजार करोड़ रूपए , 1 लाख 75 हजार करोड़ रूपए डकार गये और ........................................ आखिर हमारी बनाई नीतियां कारगर सिद्ध हो रही हैं न ! परन्तु इतने घोटालों के चलते कुछ बेवकूफ तथा निराशावादी किस्म के लोग यह मानने लग गये हैं कि देश में पर्याप्त किस्मों के घोटाले हो चुके हैं तथा अब और घोटाले संभव नहीं / मैंने अपने एक नेता - मित्र से बात की, कि बंधू आजकल किस नए घोटाले के गुताड़े में हो , तो वह दुखी होकर रोने लगा कि यार , अब कोई नयाँ घोटाला तो बचा ही नहीं है , क्या करें ? सब तो कर चुके / देश बेच दिया , सारे बैंक ख़ाली कर दिए, राष्ट्र की खाट खड़ी करके उसके पाए निकालकर बेच डाले , भारत की जमीन कि रजिस्ट्री बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नाम कर दी , हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच खाई को इतना खोदा कि अब स्वयं ही उस खाई में हमारी कब्र बन गई है / अब घोटाला करने को और बचा ही क्या है , जो करें ? मैं उसके दुःख से दुखी हुआ / मेरा क्या है कि किसी का दुःख देखा नहीं जाता मुझसे / मैंने अपना कर्तव्य निभाते हुए अपने नेता मित्र को समझाया कि घोटालों के अवसर अभी भी अनन्त हैं / दूरदृष्टी  और पक्के इरादे के अपने पुराने तिलिस्मी नारे को याद कीजिए और लग लीजिए / हिम्मत करो तो घोटाले ही घोटाले / काहे को टालें / बस ,रखें रहें तिकडमों कि बरछियां , जुगाड़ों के तीर और राजनीति के भाले / मैंने उसे सलाह देते कहा कि देश को किराए पर चढ़ा दो , ऊँची पगड़ी लेकर / पगड़ी कि रकम स्विस बैंक में / या ये घपला ट्राई कीजिए , लाल किले कि ईंटें बेच दीजिए , ताजमहल की नीवं की बोली लगवा दीजिए और संसद की पुताई का ठेका अमेरिका को दे दीजिए / बिल्लियों को चूहा पकड़ने की ट्रेनिंग देने के लिए विदेश भिजवाईए / संसद अपने सत्रों के इलावा और दिनों में ख़ाली पड़ी रहती है , ख़ाली संसद को किराए पर चढ़ा दें / देखिए तो / घपले अनेक हैं / अभी किया ही क्या है ? घपले करो / बनाइए जनता को उल्लू / पकड़े जाएँ तो कहिए दोष व्यवस्था का है , जो हमसे घोटाले करवाती है / वरना हम तो भोले हैं / हम तो गऊ हैं / घास खाने निकलते हैं और जहां हरी - हरी दिखी तो मुहँ मार लेते हैं और गोबर भी नहीं करते / बस वैसा ही कुछ ब्यान दीजिए / लोग मान लेंगे / ' बेचारा ' - ऐसा कहेंगे वे / हो सकता है कि सहानुभूति कि लहर चल पड़े आपके पक्ष में कि लेते सभी हैं , पर बेचारा यही फंस गया / क्या करे बेचारा , उपर तक तो पहुंचना पड़ता है / गलत जगह सहानुभूति रखने कि उज्जवल परम्परा है भारतीय जन कि / आप डरिए मत / आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा / पहले वालों का कोनसा बिगड़ा है ? आइए , घोटाला करें / खैर कर तो आप बरसों से रहे हैं / मेरा तात्पर्य है कि रुकें नहीं / करते रहें /

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